तुम तरस नहीं खाते–

लोग टूट जाते हैं, एक घर बनाने में,
तुम तरस नहीं खाते, बस्तियाँ जलाने में|

बशीर बद्र

2 responses to “तुम तरस नहीं खाते–”

  1. वाह , बहुत सुन्दर लिखा है |

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    1. shri.krishna.sharma avatar
      shri.krishna.sharma

      जी, हार्दिक धन्यवाद।

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