अंग-अंग चंदन वन हो गया!

हिन्दी के एक प्रमुख कवि और बच्चों के लिए ‘पराग’ पत्रिका का संपादन करने वाले स्वर्गीय कन्हैया लाल नंदन जी की एक कविता आज शेयर कर रहा हूँ | यह एक श्रेष्ठ रूमानी कविता है, आशा है आप सभी को पसंद आएगी|

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय कन्हैया लाल नंदन जी की यह कविता –

एक नाम अधरों पर आया,
अंग-अंग चंदन वन हो गया|

बोल है कि वेद की ऋचायें
सांसों में सूरज उग आयें,
आखों में ऋतुपति के छंद तैरने लगे
मन सारा नील गगन हो गया|

गंध गुंथी बाहों का घेरा
जैसे मधुमास का सवेरा,
फूलों की भाषा में देह बोलने लगी
पूजा का एक जतन हो गया|

पानी पर खीचकर लकीरें
काट नहीं सकते जंजीरें,
आसपास अजनबी अधेरों के डेरे हैं
अग्निबिंदु और सघन हो गया|

एक नाम अधरों पर आया,
अंग-अंग चंदन वन हो गया|

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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2 responses to “अंग-अंग चंदन वन हो गया!”

    1. shri.krishna.sharma avatar
      shri.krishna.sharma

      Thanks a lot ji.

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