कभी कभी !

हिन्दी काव्य मंचों के अत्यंत कुशल गीतकार स्वर्गीय रमानाथ अवस्थी जी के कुछ गीत मैंने पहले भी शेयर किए हैं, हिन्दी गीत साहित्य में उनका अमूल्य योगदान रहा है|
आज मैं स्वर्गीय रमानाथ अवस्थी जी का एक गीत शेयर कर रहा हूं-

कभी कभी जब मेरी तबियत
यों ही घबराने लगती है,
तभी ज़िन्दगी मुझे न जाने
क्या-क्या समझाने लगती है|

रात, रात भर को ही मिलती
दिन भी मिलता दिन भर को,
कोई पूरी तरह न मिलता
रमानाथ लौटो घर को|

घर भी बिन दीवारों वाला
जिसकी कोई राह नहीं,
पहुँच सका तो पहुँचूँगा मैं
वैसे कुछ परवाह नहीं|


मंज़िल के दीवाने मन पर
जब दुविधा छाने लगती है,
तभी ज़िन्दगी मुझे न जाने
क्या-क्या समझाने लगती है|

पूरी होने की उम्मीद में
रही सदा हर नींद अधूरी,
तन चाहे जितना सुंदर हो
मरना तो उसकी मज़बूरी|

मज़बूरी की मार सभी को
मज़बूरन सहनी पड़ती है|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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2 responses to “कभी कभी !”

  1. सुन्दर रचना |

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    1. shri.krishna.sharma avatar
      shri.krishna.sharma

      हार्दिक धन्यवाद जी।

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