हिन्दी काव्य मंचों के अत्यंत कुशल गीतकार स्वर्गीय रमानाथ अवस्थी जी के कुछ गीत मैंने पहले भी शेयर किए हैं, हिन्दी गीत साहित्य में उनका अमूल्य योगदान रहा है|
आज मैं स्वर्गीय रमानाथ अवस्थी जी का एक गीत शेयर कर रहा हूं-

कभी कभी जब मेरी तबियत
यों ही घबराने लगती है,
तभी ज़िन्दगी मुझे न जाने
क्या-क्या समझाने लगती है|
रात, रात भर को ही मिलती
दिन भी मिलता दिन भर को,
कोई पूरी तरह न मिलता
रमानाथ लौटो घर को|
घर भी बिन दीवारों वाला
जिसकी कोई राह नहीं,
पहुँच सका तो पहुँचूँगा मैं
वैसे कुछ परवाह नहीं|
मंज़िल के दीवाने मन पर
जब दुविधा छाने लगती है,
तभी ज़िन्दगी मुझे न जाने
क्या-क्या समझाने लगती है|
पूरी होने की उम्मीद में
रही सदा हर नींद अधूरी,
तन चाहे जितना सुंदर हो
मरना तो उसकी मज़बूरी|
मज़बूरी की मार सभी को
मज़बूरन सहनी पड़ती है|
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
********
Leave a reply to vermavkv Cancel reply