कभी पहले जैसे, मिला न हो!

डॉक्टर बशीर बद्र, आज की उर्दू शायरी में एक जाना-पहचाना नाम है| उनको विशेष रूप से शायरी में एक्सपेरीमेंट करने के लिए जाना जाता है| अनेक शेर उनके लोगों के ज़ेहन में छाए रहते हैं, जैसे ‘उजाले अपनी यादों के, हमारे साथ रहने दो’, ‘कोई हाथ भी न मिलाएगा, जो गले मिलोगे तपाक से, ये नए मिजाज़ का शहर है, ज़रा फासले से मिला करो’, ‘लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में, तुमको डर नहीं लगता, बस्तियां जलाने में‘ आदि |

लीजिए आज प्रस्तुत है डॉक्टर बशीर बद्र की यह ग़ज़ल –


कभी यूँ मिलें कोई मसलेहत, कोई ख़ौफ़ दिल में ज़रा न हो,
मुझे अपनी कोई ख़बर न हो, तुझे अपना कोई पता न हो|

वो फ़िराक़ हो या विसाल हो, तेरी याद महकेगी एक दिन,
वो ग़ुलाब बन के खिलेगा क्या, जो चिराग़ बन के जला न हो|

कभी धूप दे, कभी बदलियाँ, दिलो-जाँ से दोनों क़ुबूल हैं,
मगर उस नगर में न क़ैद कर, जहाँ ज़िन्दगी की हवा न हो|

वो हज़ारों बाग़ों का बाग़ हो, तेरी बरक़तों की बहार से,
जहाँ कोई शाख़ हरी न हो, जहाँ कोई फूल खिला न हो|

तेरे इख़्तियार में क्या नहीं, मुझे इस तरह से नवाज़ दे,
यूँ दुआयें मेरी क़ुबूल हों, मेरे दिल में कोई दुआ न हो|

कभी हम भी जिस के क़रीब थे, दिलो-जाँ से बढ़कर अज़ीज़ थे,

मगर आज ऐसे मिला है वो, कभी पहले जैसे मिला न हो|

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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2 responses to “कभी पहले जैसे, मिला न हो!”

  1. वाह, बहुत सुन्दर |

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    1. shri.krishna.sharma avatar
      shri.krishna.sharma

      बहुत बहुत धन्यवाद जी।

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