आज एक बार फिर से मैं स्वर्गीय रमेश रंजक जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ| यह गीत रंजक जी की प्रारंभिक प्रसिद्ध रचनाओं में से एक है और यह उनके एक नवगीत संकलन का शीर्षक गीत था| प्रकृति के कुछ सुंदर चित्र इस गीत में उकेरे गए हैं||
लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय रमेश रंजक जी का यह नवगीत –

हल्दी चढ़ी पहाड़ी देखी
मेंहदी रची धरा
अंधियारे के साथ पाहुना
गीत-विहग उतरा ।
गांव फूल-से गूंथ दिए
सर्पिल पगडंडी ने,
छोर फैलते गए
मसहरी के झीने-झीने,
दिन, जैसे बांसुरी बजाता
बनजारा गुज़रा।
पोंछ पसीना ली अंगड़ाई
थकी क्रियाओं ने,
सौंप दिये मीठे सम्बोधन
खुली भुजाओं ने
जोड़ गया संदर्भ मनचला
मौसम हरा-भरा।
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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