करवट भी बदलने नहीं देते!

किस नाज़ से कहते हैं वो झुंझला के शब-ए-वस्ल,
तुम तो हमें करवट भी बदलने नहीं देते|

अकबर इलाहाबादी

2 responses to “करवट भी बदलने नहीं देते!”

  1. अ॑गारे मेरे जिस्म से लिपटे हैं इस कदर।
    ख्वाहिश पिया के दीद की जलने नहीं देती।

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    1. shri.krishna.sharma avatar
      shri.krishna.sharma

      वाह जी।

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