दोपहर न भाये मुझे!

मैं अपने पाँव तले रौंदता हूँ साये को
बदन मेरा ही सही दोपहर न भाये मुझे।

क़तील शिफ़ाई

2 responses to “दोपहर न भाये मुझे!”

    1. shri.krishna.sharma avatar
      shri.krishna.sharma

      Thanks a lot ji.

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