आवारगी 2

ये दिल, ये पागल दिल मेरा क्यों बुझ गया, आवारगी
इस दश्त में इक शहर था वो क्या हुआ, आवारगी।

मोहसिन नक़वी

4 responses to “आवारगी 2”

  1. गुलाम अली की सुन्दर ग़ज़ल |

    Like

    1. shri.krishna.sharma avatar
      shri.krishna.sharma

      जी वास्तव में मोहसिन नक़वी जी की लिखी इस ग़ज़ल को गुलाम अली जी ने बहुत खूबसूरती से गाया है।

      Like

      1. जी, सही कहा आपने । इस गाना को जितना भी सुनो जी नही भरता है ।

        Like

      2. shri.krishna.sharma avatar
        shri.krishna.sharma

        जी सही कहा आपने।

        Like

Leave a reply to shri.krishna.sharma Cancel reply