अकबर इलाहाबादी साहब एक महान शायर थे जिन्होंने मजाहिया से लेकर गंभीर तक, सभी प्रकार की शायरी की है| जैसे- ‘क़ौम के ग़म में डिनर खाते हैं हुक्काम के साथ’ से लेकर ‘हंगामा है क्यों बरपा, थोड़ी सी जो पी ली है’ तक|
लीजिए आज प्रस्तुत है, अकबर इलाहाबादी साहब की यह ग़ज़ल–

आँखें मुझे तल्वों से वो मलने नहीं देते,
अरमान मेरे दिल का निकलने नहीं देते|
ख़ातिर से तेरी याद को टलने नहीं देते,
सच है कि हमीं दिल को संभलने नहीं देते|
किस नाज़ से कहते हैं वो झुंझला के शब-ए-वस्ल,
तुम तो हमें करवट भी बदलने नहीं देते|
परवानों ने फ़ानूस को देखा तो ये बोले,
क्यों हम को जलाते हो कि जलने नहीं देते|
हैरान हूँ किस तरह करूँ अर्ज़-ए-तमन्ना,
दुश्मन को तो पहलू से वो टलने नहीं देते|
दिल वो है कि फ़रियाद से लबरेज़ है हर वक़्त,
हम वो हैं कि कुछ मुँह से निकलने नहीं देते|
गर्मी-ए-मोहब्बत में वो है आह से माने,
पंखा नफ़स-ए-सर्द का झलने नहीं देते|
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार
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