एक मुट्ठी धान में!

आज मैं प्रसिद्ध कवि और पूर्व सांसद- श्री उदय प्रताप सिंह जी की एक ग़ज़ल शेयर कर रहा हूँ| माननीय उदय प्रताप जन प्रतिनिधि हैं और सामान्य जन की चिंताओं से उनका सीधा सरोकार भी है| श्री उदय प्रताप सिंह जी संसदीय राजभाषा समिति के सदस्य के रूप में मेरे पूर्व संस्थान – एनटीपीसी में भी आए थे और वहां आयोजित कवि-सम्मेलन में उनका काव्य पाठ सुनने का सुअवसर भी मुझे मिला था|

लीजिए आज प्रस्तुत है श्री उदय प्रताप सिंह जी की यह ग़ज़ल –

ये रोज कोई पूछता है मेरे कान में
हिंदोस्ताँ कहाँ है अब हिंदोस्तान में।

इन बादलों की आँख में पानी नहीं रहा
तन बेचती है भूख एक मुट्ठी धान में।

तस्वीर के लिये भी कोई रूप चाहिये
ये आईना अभिशाप है सूने मकान में।

जनतंत्र में जोंकों की कोई आस्था नहीं
क्या फ़ायदा संशोधनों से संविधान में।


मानो न मानो तुम ’उदय’ लक्षण सुबह के हैं
चमकीला तारा कोई नहीं आसमान में।


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।
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2 responses to “एक मुट्ठी धान में!”

    1. shri.krishna.sharma avatar
      shri.krishna.sharma

      Thanks a lot ji.

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