डॉक्टर कुँवर बेचैन जी मेरे लिए गुरु तुल्य हैं, मैं भी कुछ समय उसी महाविद्यालय का छात्र रहा जिसमें वे प्रोफेसर थे| दिल्ली में रहते हुए कवि गोष्ठियों में तो उनसे भेंट होती ही रही, बाद में एक आयोजक की भूमिका निभाते हुए भी उनको कवि सम्मेलनों में आमंत्रित करने का सौभाग्य मुझे मिला| बहुत समर्थ रचनाकार और सरल हृदय व्यक्ति हैं, ईश्वर उनको लंबी उम्र दें|
लीजिए प्रस्तुत है डॉक्टर कुँवर बेचैन जी का यह गीत-

सूरज !
सोख न लेना पानी !
तड़प तड़प कर मर जाएगी
मन की मीन सयानी !
सूरज, सोख न लेना पानी !
बहती नदिया सारा जीवन
साँसें जल की धारा,
जिस पर तैर रहा नावों-सा
अंधियारा उजियारा,
बूंद-बूंद में गूँज रही है
कोई प्रेम कहानी !
सूरज, सोख न लेना पानी !
यह दुनिया पनघट की हलचल
पनिहारिन का मेला,
नाच रहा है मन पायल का
हर घुंघुरू अलबेला|
लहरें बाँच रही हैं
मन की कोई बात पुरानी !
सूरज, सोख न लेना पानी !
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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