जैसे कोई हंस अकेला, आंगन में उतरे!

आज हिन्दी नवगीत के अनूठे हस्ताक्षर माहेश्वर तिवारी जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| गीत-कविता आदि स्वयं ही अपनी बात कहते हैं, उसके बारे में अलग से कुछ कहने की आवश्यकता नहीं होती| किसी की याद को लेकर कितनी सुंदर अभिव्यक्ति इस गीत में दी गई है, आइए इस गीत का आनंद लेते हैं-

 

 

याद तुम्हारी जैसे कोई
कंचन-कलश भरे।
जैसे कोई किरन अकेली
पर्वत पार करे।

 

लौट रही गायों के
संग-संग
याद तुम्हारी आती,
और धूल के
संग-संग
मेरे माथे को छू जाती,
दर्पण में अपनी ही छाया-सी
रह-रह उभरे,
जैसे कोई हंस अकेला
आंगन में उतरे।

 

जब इकला कपोत का
जोड़ा
कंगनी पर आ जाए,
दूर चिनारों के
वन से
कोई वंशी स्वर आए,
सो जाता सूखी टहनी पर
अपने अधर धरे|
लगता जैसे रीते घट से
कोई प्यास हरे।

 

 

आज के लिए इतना ही|
नमस्कार|

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One response to “जैसे कोई हंस अकेला, आंगन में उतरे!”

  1. I’m sure that in the original language it’s even nicer, but even with the translator this poem is very meaningful 🙂

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