आज निदा फाज़ली साहब की लिखी एक गज़ल शेयर करने का मन है। निदा साहब सधुक्कडी भाषा में, सामान्य सी शब्दावली में बहुत गहरी बात कह जाते थे। आज यह गज़ल पढ़ लीजिए, जो अपने आप ही अपनी बात कह देती है-

कुछ भी बचा न कहने को हर बात हो गई,
आओ कहीं शराब पिएं रात हो गई।
फिर यूं हुआ कि वक़्त का पांसा पलट गया,
उम्मीद जीत की थी मगर मात हो गई।
सूरज को चोंच में लिए मुर्ग़ा खड़ा रहा,
खिड़की के पर्दे खींच दिए रात हो गई।
वो आदमी था कितना भला कितना पुर-ख़ुलूस,
उस से भी आज लीजे मुलाक़ात हो गई।
रस्ते में वो मिला था मैं बच कर गुज़र गया,
उसकी फटी क़मीज मेरे साथ हो गई।
नक़्शा उठा के कोई नया शहर ढूंढिए,
इस शहर में तो सब से मुलाक़ात हो गई।
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।
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