पिछली बार जो युगल गीत शेयर किया था, बिना कारण नायिका की फिक्र करने वाले दीवाने नायक का, खुदाई खिदमदगार का, कुछ उसी तरह का गीत आज याद आ रहा है। इस गीत को मुकेश जी के साथ लता जी ने गाया है, फिल्म है- 1961 में रिलीज़ हुई- नज़राना, इसमें भी नायक तो राजकपूर ही थे और उनके साथ नायिका थीं- वैजयंती माला जी । राजिंदर कृष्ण जी के लिखे गीत को संगीतबद्ध किया था संगीतकार- रवि जी ने।
नायक-नायिका के इस चुलबुले संवाद में यह तो सब समझ ही जाएंगे कि कौन सा उद्गार नायक का है और कौन सा नायिका का!
लीजिए यह गीत भी आपकी सेवा में प्रस्तुत है-

बिखरा के ज़ुल्फ़ें चमन में न जाना
– क्यों?
इस लिये, कि शर्मा न जायें फूलों के साये।
मोहब्बत के नग़मे तुम भी न गाना
– क्यों?
इस लिये, कि भँवरा तुम्हारी हँसी न उड़ाये।
बिखरा के ज़ुल्फ़ें चमन में न जाना॥
मोहब्बत के भँवरे की पहचान क्या?
ये कलियों से पूछो हमें क्या पता -२
हरजाई होगा, हम तो नहीं हैं।
कहीं सीख लेना न तुम ये अदा।
ज़ुबां पर कभी बात ऐसी न लाना,
क्यों,
इसलिए कि दुनिया से रस्म-ए-वफा मिट न जाए।
बिखरा के ज़ुल्फ़ें चमन में न जाना॥
कहो साथ दोगे कहाँ तक मेरा?
वहाँ तक जहाँ आसमाँ झुक रहा -२
बोलो चलोगी?
जो तुम ले चलोगे,
कहीं राह में हो न जाना जुदा।
मेरा प्यार देखेगा सारा ज़माना
– क्यों?
इसलिये, कि वादे किये और कर के निभाये।
बिखरा के ज़ुल्फ़ें चमन में न जाना।।
मोहब्बत के नग़मे तुम भी न गाना
– क्यों?
इसलिये, कि भँवरा तुम्हारी हँसी न उड़ाये।।
आज के लिए इतना ही।
नमस्कार।
Leave a reply to Abhijit Ray Cancel reply