क्या मेरे हक़ में फ़ैसला देगा!

हम अपने जीवन में बहुत सी अच्छी कविताएं और गज़लें सुनते हैं, उनका आनंद लेते हैं। कुछ गीत पंक्तियां, कुछ शेर ऐसे हो जाते हैं जिनको अक्सर ‘उद्धृत’ किया जाता है, लोग अपनी बात पर बल देने के लिए उनको ‘क़ोट’ करते हैं।

अभी आज ही किसी राजनैतिक बहस में किसी ने एक शेर पढ़ दिया और मुझे श्री सुदर्शन फाकिर जी की लिखी यह गज़ल याद आ गई, जिसे जगजीत सिंह जी और चित्रा सिंह जी ने बड़े मधुर ढ़ंग से गाया है।

लीजिए आज प्रस्तुत है यह प्यारी सी गज़ल-

आदमी आदमी को क्या देगा,
जो भी देगा वही ख़ुदा देगा।

मेरा क़ातिल ही मेरा मुंसिब है,
क्या मेरे हक़ में फ़ैसला देगा।

ज़िन्दगी को क़रीब से देखो,
इसका चेहरा तुम्हें रुला देगा।

हमसे पूछो न दोस्ती का सिला,
दुश्मनों का भी दिल हिला देगा।

इश्क़ का ज़हर पी लिया “फ़ाकिर”
अब मसीहा भी क्या दवा देगा।

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।


One response to “क्या मेरे हक़ में फ़ैसला देगा!”

Leave a reply to Abhijit Ray Cancel reply