186 . धूल हूँ मैं, वो पवन बसंती!

आज एक बहुत प्यारा गीत शेयर कर रहा हूँ, जो फिल्म ‘धरती कहे पुकार के’ के लिए मुकेश जी ने गाया था। गीत मजरूह सुल्तानपुरी जी ने लिखा था और इसका संगीत दिया था- लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल जी की जोड़ी ने।
एक और गीत सुना होगा आपने- ‘बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना’, यह गीत भी उस तरह का कहा जा सकता है, लेकिन इसमें एक फर्क़ है, बहुत बड़ा फर्क़ है। अंतर यह है कि जिस शादी में नायक गा रहा है, उसमें सेहरा वास्तव में उसके सिर पार बंधने वाला था।
भारतीय फिल्मों मे ऐसी सिचुएशन अक्सर दिखाई जाती हैं, और नायक महोदय वहाँ गाने के लिए पहुंच जाते हैं, जैसे यह भी कि ‘खुश रहे तू सदा, ये दुआ है मेरी’!
वास्तविक जीवन में शायद ऐसा होने पर वह व्यक्ति (नायक) वहाँ जाता ही नहीं होगा।
लेकिन यह तो विवाह का उदाहरण है, जीवन में आपका कोई विचार, कोई प्लान, कोई ड्रीम प्रोजेक्ट हो सकता है, जो आपको बहुत प्यारा है, जिसके बारे में आप अपने किसी साथी से चर्चा कर लेते हैं, और वह आपके इस प्रोजेक्ट को अपना बनाकर बॉस को प्रस्तुत कर देता है, और फिर सबके सामने प्रेज़ेंट करता है, और आपको भी बैठकर ताली बजानी पड़ती है। ऐसी घटनाएं तो होती ही हैं। फिर अगर आपका वह साथी बॉस के पैरों में गिरने में माहिर हो, तो आपके कहने पर भी बॉस नहीं मानेगा कि वह आपका आइडिया था।
खैर हम इस गीत के बारे में ही बात करते हैं, जिसे मुकेश जी ने अपनी दर्द भरी आवाज में गाकर अमर कर दिया है-

खुशी की वो रात आ गई, कोई गीत जगने दो
गाओ रे झूम झूम, गाओ रे झूम झूम
कहीं कोई काँटा लगे, जो पग में तो लगने दो
नाचो रे झूम झूम, गाओ रे झूम झूम ।

आज हँसूं मैं इतना कि मेरी आँख लगे रोने,
आज मैं इतना गाउं की मन में दर्द लगे होने,
मजे में सवेरे तलक, यही गीत को बजने दो,
नाचो रे झूम झूम, गाओ रे झूम झूम।

धूल हूँ मैं वो पवन बसंती क्यों मेरा संग धरे,
मेरी नहीं तो और किसी की बैंया में रंग भरे,
दो नैनो में आँसू लिए, दुल्हनिया को सजने दो,
नाचो रे झूम झूम, गाओ रे झूम झूम।

नमस्कार।

2 responses to “186 . धूल हूँ मैं, वो पवन बसंती!”

  1. Nicely written

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    1. Thanks dear

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