185. ग़म-ए-हयात से कह दो ख़रीद लाये मुझे!

आज फिर से क़तील शिफाई जी की लिखी एक गज़ल आ रही है, खास तौर पर इसका एक शेर- ‘वो मेरा दोस्त है, सारे जहाँ को है मालूम, दग़ा करे वो किसी से तो शर्म आए मुझे! सचमुच बहुत सुंदर भाव है, और यह भी ‘कि संग तुझपे गिरे और ज़ख्म आए मुझे’, वास्तव में कविता, शायरी आदि को साहित्य इसीलिए कहा जाता है, क्योंकि इनमें ‘सहित’ का, सबके सुख-दुख को साझा करने, समझने का भाव होता है।
‘इंक्लूज़न’ की जो बात आज राजनीति में कही जाती है, वही तो साहित्य का केंद्रीय बिंदु है, क़तील शिफाई साहब ने बहुत सी सुंदर गज़लें लिखी हैं, यह भी उनमें से एक है, इस गज़ल को अन्य गायकों के साथ ही जगजीत सिंह, चित्रा सिंह ने बड़े सुंदर ढंग से प्रस्तुत किया है-

ये मोजज़ा भी मुहब्बत कभी दिखाये मुझे
कि संग तुझपे गिरे और ज़ख़्म आये मुझे।

वो महरबाँ है तो इक़रार क्यूँ नहीं करता
वो बदगुमाँ है तो सौ बार आज़माये मुझे।

मैं अपने पाँव तले रौंदता हूँ साये को
बदन मेरा ही सही दोपहर न भाये मुझे।

वही तो सबसे ज़ियादा है नुक्ता-चीं मेरा

 जो मुस्कुरा के हमेशा गले लगाये मुझे।

वो मेरा दोस्त है सारे जहाँ को है मालूम
दग़ा करे वो किसी से तो शर्म आये मुझे।

मैं अपनी ज़ात में नीलाम हो रहा हूँ “क़तील”
ग़म-ए-हयात से कह दो ख़रीद लाये मुझे।

नमस्कार।
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2 responses to “185. ग़म-ए-हयात से कह दो ख़रीद लाये मुझे!”

  1. Nice post

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    1. Thanks dear.

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