169. वहीँ खाक़ अपनी उड़ाने चला हूँ।!

चंद तस्वीर-ए-बुतां , चंद हसीनों के खुतूत !
बाद मरने के मेरे घर से ये सामान निकला !!

आज चचा ग़ालिब का ये शेर याद आया, तो ये खयाल आया कि कैसे-कैसे लोग होते थे, बल्कि आज भी होते हैं, जो इतने भर से गुज़ारा कर लेते हैं। लेकिन अपना साज़-ओ-सामान समेटते-समेटते हमारा ध्यान उस तरफ जा कहाँ पाता है।

वैसे तो गरीबी इतनी है अपने देश में, और जगहों पर भी होगी, पर मुझे तो अपने देश के ही बारे में सोचना है!
लेकिन आज जिस बारे में बात कर रहे हैं, वो गरीबी नहीं है बल्कि दीवानगी है, जिसमें ये पैसा-कौड़ी जमा करने की फुर्सत ही नहीं रहती!

प्रेम गली अति सांकरी, ता में दो न समाईं।

और जब तक पता चलता है कि बीमारी तो ये है, तब तक बहुत देर हो चुकी होती है।

और जब इसका इलाज करने का फैसला कर लेता है कोई, तब क्या होता है!

छोड़िए, एक गीत याद आ रहा है, फिल्म ‘हरियाली और रास्ता’ के लिए शैलेंद्र जी का लिखा हुआ और मेरे प्रिय गायक मुकेश जी का गाया हुआ, इसका आनंद लीजिए-

तेरी याद दिल से भुलाने चला हूँ
कि खुद अपनी हस्ती मिटाने चला हूँ।

घटाओं तुम्हें साथ देना पड़ेगा
मैं फिर आज आंसू बहाने चला हूँ।
तेरी याद दिल से…

कभी जिस जगह ख्वाब देखे थे मैंने
वहीँ खाक़ अपनी उड़ाने चला हूँ।
तेरी याद दिल से…

गम-ए-इश्क ले, फूंक दे मेरा दामन
मैं अपनी लगी यूं, बुझाने चला हूँ।
तेरी याद दिल से…

अब इसके बाद क्या कहूं!

नमस्कार।

4 responses to “169. वहीँ खाक़ अपनी उड़ाने चला हूँ।!”

  1. Good post

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    1. Thanks.

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  2. Main aapki har post ko padhta hoon…
    Padhkar good feel hota hai

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    1. Thanks dear.

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