162. ठेले पर हिमालय

डॉ. धर्मवीर भारती की रचना का शीर्षक याद आ गया, जो उन्होंने इलाहाबाद में ठेले पर अमरूद का ऊंचा पहाड़ बनाकार बेचने वालों को ध्यान में रखकर लिखा था।
दरअसल मैं मुहल्लों को याद कर रहा था, पुराने ज़माने के, जब हमारा बचपन था! सुबह-सुबह मुहल्ले में कुछ आवाजें आनी शुरू हो जाती थीं। कोई सामान बेचने वाला, खिलौने वाला, गुब्बारे वाला, चीनी गर्म करके, एक गोले को घुमाते हुए ‘बुढ़िया के गुलाबी बाल’ बेचने वाला, जिनका मुलायम गोला खाने में बहुत स्वादिष्ट लगता था।
उन दिनों तमाशा दिखाने वाला तो हर दिन कोई न कोई आता ही रहता था। वो बंदर का तमाशा हो, भालू का हो या फिर जादू का हो। यह भी बता दूं कि मैंने गलियों में जादू के कुछ ऐसे करतब देखे हैं जो आज अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर दिखाए जाते हैं।
खैर जैसा मैंने कहा, वो तो शायद किसी और जमाने की बातें थीं। यह भी हो सकता है कि कुछ पुराने किस्म के मुहल्लों में वह सब आज भी जीवित हो। आधुनिक नगरों, सोसायटियों में तो उस ‘साउंड पोल्यूशन’ पर पूरी तरह काबू पा लिया गया। वर्चुअल मुहल्लों में कुछ लोग प्रतिदिन अथवा अक्सर अपना खोमचा लगाकर बैठ जाते हैं, जैसा कि अभी मैं कर रहा हूँ। यहाँ जिसका मन होता है वह इस तमाशे को देखता है, जिसका मन हो वह यह बता भी देता है कि मैंने देखा और जैसा भी लगा हो। वैसे यहाँ भी अगर अचार-मुरब्बे बनाने जैसी उपयोगी जानकारी दी जाए तो लोगों को ज्यादा अच्छा लगता है या कोई सनसनीखेज जानकारी दी जाए, जो भले ही बाद में गलत साबित हो जाए, तब लोगों में कुछ रोमांच होता है।
ये सोशल मीडिया ही आज का जीवंत मुहल्ला है। पहले जब लोग स्वयं को अभिव्यक्त करना चाहते थे तब कविता, कहानी वगैरा लिखते थे, फिर उसको प्रकाशित अथवा प्रसारित करने के लिए पापड़ बेलने पड़ते थे। आज के इस मुहल्ले में प्रवेश करना तो बहुत आसान हो गया है, लेकिन कोई आपकी तरफ देखे या न देखे, यह तो उसकी इच्छा पर निर्भर है। अपने प्रोडक्ट की मार्केटिंग तो आपको करनी ही पड़ेगी। मुझे याद है इस विषय पर गुरुदत्त जी की फिल्म ‘प्यासा’ में भी लेखक की वेदना व्यक्त की गई थी, जब लोग उसकी रचनाओं को नहीं पढ़ते, सराहते तो वह लिखता है- ‘हटा लो इसे, फूंक डालो ये दुनिया’! इस पर किसी समीक्षक ने लिखा था कि आपने कुछ ऊल-जलूल लिख दिया तो क्या यह लोगों की ज़िम्मेदारी है कि वे उसको पढ़ें और सराहें ताकि आपको रॉयल्टी मिल सके। खैर हमें तो ऐसी कुछ उम्मीद नहीं है, मन हो तो पढ़ लीजिए, इच्छा हो तो कुछ कमेंट कर दीजिए, क्योंकि यह लिखने की बस आदत बन जाती है न-

फाक़िर सनमकदे में न आता मैं लौटकर
एक ज़ख्म भर गया था, इधर ले के आ गया।

नमस्कार।

2 responses to “162. ठेले पर हिमालय”

  1. Nice post

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    1. Thanks dear

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