आज एक नवगीत याद आ रहा है, नीलम सिंह जी का लिखा हुआ, यह गीत जिस समय मैंने पढ़ा था, बहुत अच्छा लगा था और आज तक याद है।
इस गीत में जो मुख्यतः अभिव्यक्त किया गया है, वह यही है कि जीवन में जो कुछ झेलना पड़ता है, उसके बारे में सोचते रहें, मन को कोसते रहें, इससे बेहतर है कि मन को कहीं और लगाएं और आगे बढ़ें।
बहुत से लोग गीत को पलायन भी कहते हैं, शायद कुछ मायनों में सही भी हो, लेकिन गीत मन को बहुत शक्ति भी देते हैं, जो खालिस तर्कों से नहीं मिल सकती।
खैर आइए नीलम सिंह जी का यह गीत पढ़ते हैं-
धूप, धुआं, पानी में, ऋतु की मनमानी में,
सूख गए पौधे तो मन को मत कोसना,
और काम सोचना।
अधरस्ते छूट गए, जो प्यारे मित्र,
प्याले में जब कभी तिरें उनके चित्र,
दरवाज़ा उढ़काकर, हाते को पार कर,
नाले में कागज़ की कुछ नावें छोड़ना,
कुछ हिसाब जोड़ना।
सिक्का है बंटा और बिखरा है आदमी,
झूठा भ्रम क्यों पालें, भुनना है लाज़मी,
जेब क्या, हथेली क्या,
चुप्पी क्या, बोली क्या,
विनिमय की दुनिया में, जिसे भी कुबूलना,
मूल्य भर वसूलना।
धूप, धुआं, पानी में, ऋतु की मनमानी में,
सूख गए पौधे तो मन को मत कोसना,
और काम सोचना।
नमस्कार।
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