146. इस सूने उदास मौसम में, कुछ तो यार करें

आज फिर पुराने दिनों में झांकने का मन हो रहा है, एक मित्र की याद आ रही है। बात है 1980 से 1983 के बीच की, जब मैं आकाशवाणी, जयपुर में अनुवादक के पद पर कार्यरत था और वहाँ बने कवि मित्रों में से एक थे- श्री कृष्ण कल्पित, वे उस समय जयपुर विश्वविद्यालय  से शोध कर रहे थे।

कृष्ण कल्पित जी का एक गीत मैंने शायद पहले भी शेयर किया है, वैसे दुबारा शेयर करने में क्या बुराई है, लीजिए फिर से वह सुंदर गीत पढ़ते हैं-

राजा-रानी, प्रजा-मंतरी, बेटा इकलौता

मां से कथा सुनी थी जिसका अंत नहीं होता।

बिना कहे महलों में कैसे आई पुरवाई,

राजा ने दस-बीस जनों को फांसी लगवाई,

राम-राम रटता रहता था, राजा का तोता,

मां से कथा सुनी थी, जिसका अंत नहीं होता।। 

राजा,  राज किया करता था; राजा, राज करे,

परजा भूख मरा करती थी, परजा भूख मरे,

अब मैं किसी कथानक का भी, अंत नहीं ढ़ोता,

एक कहानी सुनी, उसी का अंत नहीं होता॥

खैर जयपुर में प्रवास के दौरान, आकाशवाणी में और गोष्ठियों आदि में कल्पित जी से मिलना होता रहा।

बाद में मैंने घाटशिला, झारखंड (उस समय बिहार) में हिंदुस्तान कॉपर की मुसाबनी माइंस में कार्यग्रहण किया। उसी बीच कल्पित जी आकाशवाणी की सेवा में आ गए और उनकी तैनाती रांची में हो गई। हमारा स्थान, इत्तफाक़ से उस आकाशवाणी के क्षेत्र में आता था, सो उन्होंने, जब तक मैं वहाँ रहा, कई बार काव्य पाठ के लिए बुलाया। फिर मैं खेतड़ी राजस्थान आया और फिर मध्य प्रदेश में, एन.टी.पी.सी के एक प्रोजेक्ट में और उनसे संपर्क छूट गया।

बहुत बाद में मालूम हुआ कि वे आकाशवाणी, महानिदेशालय में किसी बड़े पद पर तैनात थे, शायद अभी भी होंगे।उनके प्रति अपनी शुभकामनाएं व्यक्त करते हुए उनका एक और सुंदर गीत, यहाँ शेयर कर रहा हूँ-

इस सूने, उदास मौसम में कुछ तो यार करें,

सूरज से गलबहियां करने, मन तैयार करें।

एक नदी है जो भीतर से बाहर आती है,

एक नदी है बाहर से भीतर जाती है,

नदियों से हम, नदियों जैसा ही व्यवहार करें।

कुछ तो यार करें।

जंगल सुनता रहा रात भर , सारी रात कही,

कटते हुए पेड़ ने उससे, सारी बात कही,

चाहे जंगल में हो लेकिन अब घरबार करें।

इस सूने, उदास मौसम में कुछ तो यार करें॥

अपने मित्र कृष्ण कल्पित जी के इन सुंदर गीतों के साथ उनका स्मरण करते हुए, मैं उनके स्वस्थ और दीर्घ जीवन की कामना करता हूँ।

नमस्कार

=============

2 responses to “146. इस सूने उदास मौसम में, कुछ तो यार करें”

  1. Nice post

    Like

    1. Thanks dear.

      Like

Leave a reply to samaysakshi Cancel reply