137. लगता है लोकतंत्र इसी तरह आता है!

पिछले कुछ दिनों से अपने कुछ पुराने गीत, कविताएं आपके साथ शेयर कर रहा हूँ, जो 1988 से 2000 के बीच लिखे गए थे, लेकिन मैंने किसी मंच से शेयर नहीं किए थे, बस कहीं कागज़ों में अंकित पड़े रह गए थे।

एक बात और कि जिस समय इनको लिखकर रखा था, तब इनमें कहीं एक शब्द बदलने में पीड़ा होती थी, आज इतने वर्षों के बाद कहीं कोई शब्द नहीं जंचता तो बड़ी बेरहमी से उसको तुरंत बदल देता हूँ, लगता ही नहीं कि इसको मैंने ही लिखा था।

एक बात और, आज की रचना में कुछ चुनावी माहौल का चित्र है, जब इसको लिखा था, तब वातावरण अलग था, चुनाव के समय बहुत से बेरोज़गारों को काम मिलता था, वोट छापने का, कट्टे बनाने का, जैसे कि बिहार में माननीय लालू यादव जी का शासन था और लगता ही नहीं था कि वे कभी सत्ता से अलग होंगे। वोटिंग मशीन ने बड़ा ज़ुल्म किया है, अपने पराक्रम के बल पर जीतने का रास्ता ही बंद कर दिया।

खैर, मैं राजनीति की बात नहीं करूंगा। आज की रचना, जो गज़ल के छंद में है, आपके सामने प्रस्तुत है-

गहरे सन्नाटे में जन-गण थर्राता है,

लगता है लोकतंत्र इसी तरह आता है।

चुनने की सुविधा और मरने का इंतजाम,

ऐसे में भी भीखू, वोट डाल आता है।

एक बार चुन लें, फिर पांच बरस मौन रहें,

पाठ धैर्य का ऐसे सिखलाया जाता है।

मंचों पर भाषण, घर में कोटा वितरण,

अपना नेता कितनी मेहनत की खाता है।

हालचाल पत्रों में प्रतिदिन लिख भेजना,

मन में इससे ही आश्वस्ति भाव आता है।

                                      (श्रीकृष्ण शर्मा)

इस बीच ब्लॉगिंग साइट पर 100 फॉलोवर का आंकड़ा भी छू लिया, मुझसे जुड़ने वालों का हार्दिक आभार। मेरा विश्वास संख्या में नहीं गुणवत्ता में है। आशा है इसी प्रकार सुरुचिसंपन्न साथी जुडते जाएंगे और इस सफर को सार्थक बनाएंगे।

नमस्कार।

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5 responses to “137. लगता है लोकतंत्र इसी तरह आता है!”

    1. shri.krishna.sharma avatar
      shri.krishna.sharma

      धन्यवाद।

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  1. सुंदर प्रस्तुति।

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  2. shri.krishna.sharma avatar
    shri.krishna.sharma

    धन्यवाद ज्योति जी।

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