134- मैं, शक्तिमान !

नया साल भी शुरु हो गया जी।

ज़िंदगी की रफ्तार और महानगरों में लगने वाले जाम इसी तरह चलते रहेंगे, क्योंकि ऐसा लगता है कि जितने फ्लाई-ओवर बनते जा रहे हैं, उतना ही ‘जाम’ भी बढ़ता जाता है।

हमारे देश के साथ एक और स्थाई समस्या है, हमारे देश से ही अलग होकर आतंकवाद की फैक्टरी बना हमारा महान पड़ौसी- पाकिस्तान। जैसे बंदर के हाथों में उस्तरा थमा दिया जाए, अपनी एटॉमिक पॉवर पर घमंड करता यह सिद्धांत रहित रहनुमाओं के हाथों में, फौज के द्वारा चलाया जा रहा देश, जो खुद हमेशा मिटने के लिए तैयार है, ऐसे में क्या करेगा कोई। पता नहीं कौन से वे महान सिद्धांत हैं, धार्मिक उन्माद है, जिसके लिए ये लोग हमेशा मरने-मारने में लगे रहते हैं।

मेरे अंदर का बच्चा यह देखकर बहुत बेचैन हो जाता है। वह बच्चा जब जागता है, स्कूल के समय मुझे याद आता है कि देशभक्ति के गीत बजा करते, लगता था सुनकर कि धमनियों में रक्त बहुत तेजी से दौड़ने लगा है।

इंसाफ की डगर पे, बच्चों दिखाओ चलके

ये देश है तुम्हारा, नेता तुम्ही हो कल के।

—————–

दे दी हमें आजादी बिना खड्ग, बिना ढाल

साबरमति के संत तूने कर दिया कमाल। 

मालूम है कि मेरे देश में ही आज कन्हैया कुमार जैसे पता नहीं कौन सी पढ़ाई पढ़े हुए लोग  हैं, जिनके लिए ‘राष्ट्र’ और ‘राष्ट्रभक्ति’ बहुत दकियानूसी शब्द हैं। और ऐसे लोगों को अपने कंधों पर उठाने वालों की संख्या भी बढ़ती जा रही है, यह शुभ लक्षण नहीं है। मेरे विचार में ये लोग भी उतने ही खतरनाक हैं, जितने देशभक्ति के नाम पर गुंडागर्दी करने वाले लोग हैं।

मैं चाहता हूँ कि पूरी दुनिया में शांति और समृद्धि हो, सभी सुखी हों। लेकिन मेरी यह कामना मेरे देश से शुरू होती है।

और जब हमें एक ऐसा पड़ौसी मिला है, जो हमेशा हमारी बर्बादी के प्रयास में लगा रहता है, उसके भाड़े के लोग आतंकवाद की घटनाओं को अंजाम देते रहते हैं। हमारे सैनिक उसका सामना करने में सक्षम हैं, लेकिन धोखे से हुए इन हमलों के कारण हमारे जवान शहीद होते हैं, इसका हमें अत्यंत दुख है।

एक बात, जो मेरे भीतर के बच्चे के मन में आती है, आज मैं वह शेयर करना चाहता हूँ! कभी लगता है कि जैसे ‘स्पाइडरमैन’, ‘मि. इंडिया’, शक्तिमान  आदि अनेक काल्पनिक कैरेक्टर होते हैं, खयाल आता है कि अगर ऐसी अदृश्य हो जाने की शक्ति मुझमें होती, और कोई गोली मुझ पर असर न करती और जब इतनी शक्ति मिल रही है, तो यह भी कि मैं जब चाहे जहाँ पहुंच सकता, तो मैं अपनी सेवाएं आतंकवाद प्रभावित क्षेत्रों में देता।

जैसे मानो कश्मीर के किसी गांव में या किसी बिल्डिंग में छिपे आतंकवादी तक पहुंचने में फौज को अपने बहुत से जवान खोने पड़ते हैं, और इसमें निर्दोष लोग भी मारे जाते हैं, जिनको आतंकवादी, अपना कवर बनाते हैं। वहीं मैं अदृश्य और हथियारों की मार से अप्रभावित होने के कारण उस आतंकवादी को, उसके चूहेदान से निकालकर बाहर फेंक देता, और हमारे जवानों के अमूल्य जीवन को बचाने में अपना विनम्र योगदान कर पाता।

यह जो कल्पना है, मेरा विश्वास है अदृश्य होने की काल्पनिक शक्ति के बिना भी ऐसी टैक्नोलॉजी विकसित की जा सकती है, जिससे हमारे जवानों के जीवन के इतने अधिक बलिदान के बिना भी ऐसे ऑपरेशन सफलतापूर्वक पूरे किए जा सकें।  मेरी इच्छा है कि इस दिशा में गंभीर प्रयास किए जाएं।

मेरी कामना है कि इस नए वर्ष में हम जैसे भी हो, अपने पड़ौसी को एक अच्छा सिद्धांतवादी राष्ट्र बनने पर मजबूर कर सकें।

अगर दुनिया के सभी देश,  एक साथ मिलकर प्रेम से रहें, तो उससे बेहतर क्या हो सकता है?

नमस्कार

=============

3 responses to “134- मैं, शक्तिमान !”

  1. आप बहुत खूब लिखते है। हालाँकि मैंने कई हिंदी के लेखक को पढ़ा है पर हरेक में वो बात नहीं होती। आपकी भाषा में एक अलग जादू है।

    Liked by 1 person

    1. shri.krishna.sharma avatar
      shri.krishna.sharma

      आपका बहुत बहुत धन्यवाद। आपका यह प्रोत्साहन ही मेरा संबल है।

      Liked by 1 person

  2. shri.krishna.sharma avatar
    shri.krishna.sharma

Leave a reply to arv! Cancel reply