130. बचपन

मेरी कुछ पुरानी कविताओं को शेयर करने के क्रम में, प्रस्तुत है आज की कविता-

बचपन

बचपन के बारे में,

आपके मन में भी कुछ सपनीले खयालात होंगे,

है भी ठीक, अपने आदर्श रूप में- बचपन

एक सुनहरा सपना है,

जो बीत जाने के बाद, बार-बार याद आता है।

कोशिश रहती है हमारी, कि हमारे बच्चे-

हक़ीकत को जानें अवश्य,

पर उसके कड़ुए दंश से घायल न हों।

वे ये तो जानें कि जमीन पथरीली है,

पर उससे उनके नाज़ुक पैर न छिलें,

कोशिश तो यहाँ तक होती है कि उनके पांव

जहाँ तक संभव हो-

पथरीली जमीन को छुएं भी नहीं।

खिलौनों, बादलों, खुले आसमान

और परीलोक को ही वे, अपनी दुनिया मानते रहें।

सचमुच कितने भाग्यशाली हैं ये बच्चे-

यह खयाल तब आता है, जब-

कोई दुधमुहा बच्चा, चाय की दुकान में

कप-प्लेट साफ करता है।

दुकान में चाय-नाश्ता बांटते समय

जब कुछ टूट जाता है उससे, तब

ग्राहक या दुकानदार, पूरी ताकत से

उसके गाल पर, अपनी घृणा के हस्ताक्षर करता है।

सपनों की दुनिया से अनजान ये बच्चे,

जब कहीं काम या भीख मांगते दिखते हैं,

तब आता है खयाल मन में-

कि ये बच्चे, देश का भविष्य हैं!

अपनी पूरी ताकत से कोई छोटा बच्चा

जब रिक्शा के पैडल मारता है,

तब कितनी करुणा से देखते हैं उसको आप!

हम बंटे रहें-

जातियों, संप्रदायों, देशों और प्रदेशों में,

पर क्या कोई ऐसी सूरत नहीं कि

बच्चों को हम, बच्चों की तरह देखें।

कोशिश करें कि ये नौनिहाल-

स्वप्न देखने की अवधि, तालीम की उम्र

ठीक से गुज़ारें

और उसके बाद, ज़िंदगी की लड़ाई में

अपने बलबूते पर, प्रतिभा के दम पर

शामिल हों।

क्या हम सब रच सकते हैं

इस निहायत ज़रूरी सपने को-

अपने परिवेश में!

                                                            (श्रीकृष्ण शर्मा)  

 

नमस्कार।

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7 responses to “130. बचपन”

  1. very nice lines!
    kahin khilono mein aur malmal ke bistar par sota bachpan
    kahin bheek mangkar majboori mein dum todta bachpan.

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    1. shri.krishna.sharma avatar
      shri.krishna.sharma

      Thanks.

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  2. काफी सही दर्शाया आपने सर।

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    1. shri.krishna.sharma avatar
      shri.krishna.sharma

      धन्यवाद

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  3. Very touchy lines! sir

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    1. shri.krishna.sharma avatar
      shri.krishna.sharma

      Thanks

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