अब हम फिर से एक वर्ष के आखिरी मुहाने पर हैं, जैसे कोई किसी किताब के पन्ने पलटता है, लगभग 300-350 शब्द हो जाने के बाद, वैसे ही 365 दिन के बाद, हमारे जीवन की किताब में एक और पन्ना पलट जाता है, सफर में एक और स्टेशन पीछे छूट जाता है।
अभी क्रिसमस का त्यौहार आया, जिसे दुनिया भर में मनाया जाता है और उसी दिन हमारे पूर्व प्रधान मंत्री- श्री अटल बिहारी वाजपेयी जी का जन्मदिन भी। ईश्वर उनको लंबी उम्र दे, उनकी कुछ काव्य-पंक्तियां यहाँ दे रहा हूँ-
आओ फिर से दिया जलाएं
भरी दुपहरी में अंधियारा, सूरज परछाई से हारा,
अंतरतम का नेह निचोड़ें, बुझी हुई बाती सुलगाएं।
आओ फिर से दिया जलाएं।
उनकी एक और कविता की कुछ पंक्तियां हैं, जो आज की परिस्थितियों का बहुत सुंदर वर्णन करती हैं-
हर पंचायत में पांचाली अपमानित है,
कौरव कौन, कौन पांडव, टेढ़ा सवाल है,
दोनो ओर शकुनि का फैला कूटजाल है,
धर्मराज ने छोड़ी नहीं जुए की लत है,
हर पंचायत में पांचाली अपमानित है।
बिना कृष्ण के आज महाभारत होना है,
कोई राजा बने, रंक को तो रोना है।
अटल जी की इन सुंदर पंक्तियों के बाद, फिर से इसी बात पर आते हैं, कि ज़िंदगी के सफर में मील का एक और पत्थर पार होने को है। कुछ दिनों तक समाचारों में बीत रहे वर्ष की प्रमुख घटनाएं, उपलब्धियां आदि छाई रहेंगी।
ओम प्रभाकर जी का एक बड़ा सुंदर गीत है, जो यात्रा के इस पड़ाव पर याद आ रहा है-
यात्रा के बाद भी, पथ साथ रहते हैं।
हमारे साथ रहते हैं।
खेत, खंबे, तार
सहसा टूट जाते हैं,
हमारे साथ के सब लोग
हमसे छूट जाते हैं।
मगर फिर भी
हमारी पीठ, गर्दन, बांह को छूते
गरम दो हाथ रहते हैं।
यात्रा के बाद भी, पथ साथ रहते हैं।।
घर पहुंचकर भी न होतीं
खत्म यात्राएं,
गूंजती हैं सीटियां
अब हम कहाँ जाएं,
जहाँ जाएं, वहीं
सूखे, झुके मुख-माथ रहते हैं।
यात्रा के बाद भी, पथ साथ रहते हैं।
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।
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