120. शाम और यादें!

कविताओं और फिल्मी गीतों में शाम को अक्सर यादों से जोड़ा जाता है। यह खयाल आता है कि ऐसा क्या है, जिसके कारण शाम यादों से जुड़ जाती है! यहाँ दो गीत याद आते हैं जो शाम और यादों का संबंध दर्शाते हैं। एक गीत रफी साहब का गाया हुआ, जिसकी पंक्तियां हैं-

हुई शाम उनका खयाल आ गया,

वही ज़िंदगी का सवाल आ गया।

अभी तक तो होंठों पे था, तबस्सुम का इक सिलसिला,

बहुत शादमां थे हम उनको भुलाकर, अचानक ये क्या हो गया,

कि चेहरे पे रंज़-ओ-मलाल आ गया।

हुई शाम उनका खयाल आ गया॥

हमें तो यही था गुरूर, गम-ए-यार है हमसे दूर,

वही गम जिसे हमने किस-किस जतन से, निकाला था इस दिल से दूर,

वो चलकर क़यामत की चाल आ गया।

हुई शाम उनका खयाल आ गया॥

लगता यही है कि दिन होता है गतिविधियों के लिए, जिनमें व्यक्ति व्यस्त रहता है, शाम होती है तो इंसान क्या पशु-पक्षी भी अपने बसेरों की ओर लौटते हैं। यह समय काम का नहीं सोचने का, चिंता का होता है। एक कविता की पंक्तियां याद आ रही हैं-

दिन जल्दी-जल्दी ढलता है,

बच्चे प्रत्याशा में होंगे, नीड़ों से झांक रहे होंगे,

यह ध्यान परों में पंछी के, भरता कितनी चंचलता है।

हो जाए न पथ में रात कहीं, मंज़िल भी तो है दूर नहीं,

यह सोच थका दिन का पंथी, भी जल्दी-जल्दी चलता है।

खैर मैं बात कुछ और कर रहा था, ये पंक्तियां अचानक याद आ गईं, क्योंकि ये भी शाम और चिंता का संबंध जोड़ती हैं। हाँलाकि इसमें याद उन लोगों की आ रही है, जो अभी भी साथ हैं, शायद घर पर इंतज़ार कर रहे हैं।

शाम और याद के संबंध में दूसरा गीत जो याद आ रहा है, वो मुकेश जी का गाया हुआ फिल्म ‘आनंद’ का गीत है-

कहीं दूर जब दिन ढल जाए,

शाम की दुल्हन बदन चुराए, चुपके से आए,

मेरे खयालों के आंगन में, कोई सपनों के दीप जलाए।

कभी यूं ही, जब हुईं बोझल सांसें, भर आईं बैठे-बैठे जब यूं ही आंखें।

तभी मचल के, प्यार से चलके, छुए कोई मुझे पर नज़र न आए।

 कहीं दूर जब दिन ढल जाए।।

कहीं तो ये दिल कभी मिल नहीं पाते, कहीं पे निकल आए जन्मों के नाते,

घनी ये उलझन, बैरी अपना मन, अपना ही होके सहे दर्द पराये।

कहीं दूर जब दिन ढल जाए।।

दिल जाने मेरे सारे भेद ये गहरे, हो गए कैसे मेरे सपने सुनहरे,

ये मेरे सपने, यही तो हैं अपने, मुझसे जुदा न होंगे, इनके ये साये।

कहीं दूर जब दिन ढल जाए॥

वैसे देखें तो शाम का और यादों का संबंध जोड़ने वाले बहुत सारे गीत मिल जाएंगे, और जब ये मर्ज़ बढ़ता है, तब तो पूरी रात भी जागकर गुज़रने लगता है, और इंसान तारों की चिंता करके उनसे कहने लगता कि यार तुम तो सो जाओ!

आज की शाम के लिए इतनी चिंता ही काफी है!

नमस्कार

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8 responses to “120. शाम और यादें!”

  1. राकेश avatar
    राकेश

    बहुत सुंदर सर जी,
    हर दिन आप का लेख पढ़ के कुछ नया सीखने को मिलता है।

    धन्यवाद

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  2. shri.krishna.sharma avatar
    shri.krishna.sharma

    धन्यवाद राकेश जी।

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  3. Sir, yeh Bahut sunder hai

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  4. shri.krishna.sharma avatar
    shri.krishna.sharma

    Thanks Prachi Ji.

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  5. shri.krishna.sharma avatar
    shri.krishna.sharma

    Thanks a lot.

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  6. बहुत ही शानदार लिखें हैं आपने सर।

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  7. shri.krishna.sharma avatar
    shri.krishna.sharma

    धन्यवाद कुमार जी।

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