113. तानसेन

आज तानसेन से जुड़ा एक प्रसंग याद आ रहा है, जो कहीं सुना या पढ़ा था।

अकबर के दरबार में तानसेन गाते थे और सभी मंत्रमुग्ध होकर सुनते थे। अकबर उनकी भरपूर तारीफ करते, कहते तानसेन आप कितना सुंदर गाते हो, एक दूसरी ही दुनिया में ले जाते हो। आपके जैसा कोई नहीं है।

एक बार इसी प्रकार तानसेन को सुनने के बाद अकबर ने प्रश्न किया- ‘तानसेन, क्या आपके जैसा गाने वाला कोई और भी है?

इस पर तानसेन ने कहा कि मेरे गुरूजी जैसा गाते हैं, मेरा गायन उसके सामने कुछ भी नहीं है। तानसेन ने अपने गुरू- संत हरिदास जी के बारे में बताया।

इस पर अकबर ने कहा कि हम उनको सुनना चाहते हैं, ये बताओ कि वे किस प्रकार यहाँ आ सकते हैं। आप जितना कहोगे, हम उनको दे देंगे।

इस पर तानसेन ने बताया कि संत हरिदास जी का वहाँ आना किसी प्रकार संभव नहीं है, कुछ भी देने पर वे नहीं आएंगे।

इस पर अकबर ने पूछा कि फिर उनको कैसे सुना जा सकता है?

तानसेन ने बताया कि एक ही तरीका है कि उनके आश्रम के पास जाकर, सुबह अथवा शाम के वक्त, जब वे अपनी मस्ती में गाते हैं, तब छिपकर उनको सुन लिया जाए।

इस पर अकबर वेश बदलकर, एक बैलगाड़ी में बैठकर तानसेन के साथ वहाँ गया, ये भी कहा जाता है कि शाम के समय वे देर से पहुंचे तब देर हो गई थी और संत हरिदास अपना संध्या वंदन करके शयन के लिए चले गए थे, अतः अकबर ने रात भर वहीं इंतज़ार किया, सुबह होने पर संत हरिदास जी ने बहुत देर तक मस्ती में प्रभाती गाई, अपने प्रभु के प्रेम में गाते रहे,  अकबर और तानसेन मंत्रमुग्ध होकर सुनते रहे और जब उनका गायन बंद हुआ, वे चुपचाप वापस चले गए।

अगली बार जब अकबर के सामने तानसेन अपना गायन प्रस्तुत कर रहे थे, तब अकबर ने पूछा- तानसेन, आप अपने गुरूजी के जैसा क्यों नहीं गा सकते?

इस पर तानसेन ने कहा- यह संभव ही नहीं है। मैं कुछ पाने के लिए गाता हूँ और वे अपने मन की मस्ती में, अपने प्रभु को याद करके गाते हैं। उनके गायन में जो दिव्य तत्व आता, वह मेरे गायन में आना संभव नहीं है।

नमस्कार

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2 responses to “113. तानसेन”

  1. very nice story,sir with impressive writing style. I can remember that once I listened it from my grandfather in my childhood. Thank you, sir to refresh that memory of my grandfather.

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    1. shri.krishna.sharma avatar
      shri.krishna.sharma

      Thanks dear.

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