Category: Uncategorized
-
क्या क्या गुल ओ समर फिर भी!
लुटा हुआ चमन-ए-इश्क़ है निगाहों को, दिखा गया वही क्या क्या गुल ओ समर फिर भी| फ़िराक़ गोरखपुरी
-
शाम-ए-बे-सहर फिर भी!
शब-ए-फ़िराक़ से आगे है आज मेरी नज़र, कि कट ही जाएगी ये शाम-ए-बे-सहर फिर भी| फ़िराक़ गोरखपुरी
-
आमादा-ए-सफ़र फिर भी!
झपक रही हैं ज़मान ओ मकाँ की भी आँखें, मगर है क़ाफ़िला आमादा-ए-सफ़र फिर भी| फ़िराक़ गोरखपुरी
-
नज़र नज़र फिर भी!
कहूँ ये कैसे इधर देख या न देख उधर, कि दर्द दर्द है फिर भी, नज़र नज़र फिर भी| फ़िराक़ गोरखपुरी
-
कुछ तेरी रहगुज़र फिर भी!
हज़ार बार ज़माना इधर से गुज़रा है, नई नई सी है कुछ तेरी रहगुज़र फिर भी| फ़िराक़ गोरखपुरी
-
धोका है सब मगर फिर भी!
किसी का यूँ तो हुआ कौन उम्र भर फिर भी, ये हुस्न ओ इश्क़ तो धोका है सब मगर फिर भी| फ़िराक़ गोरखपुरी
-
ग़लत समय में सही बयानी!
अपनी युवावस्था में, जब मैं दिल्ली-शाहदरा में रहता था, नई नई नौकरी शुरू की थी और कविता का शौक भी नया नया था| उस समय जिन कवियों को अक्सर गोष्ठियों आदि में सुनने का मौका मिल जाता था, उनमें शेरजंग गर्ग जी भी शामिल थे| मैंने पहले भी शायद उनकी एक-दो रचनाएं शेयर की हैं|…
-
बस किसी किसी का रहा!
गुज़रने को तो हज़ारों ही क़ाफ़िले गुज़रे, ज़मीं पे नक़्श-ए-क़दम बस किसी किसी का रहा| कैफ़ी आज़मी
-
मिरे घर में न रौशनी का रहा!
लबों से उड़ गया जुगनू की तरह नाम उसका, सहारा अब मिरे घर में न रौशनी का रहा| कैफ़ी आज़मी
-
सलीक़ा न ज़िंदगी का रहा!
जो वो मिरे न रहे मैं भी कब किसी का रहा, बिछड़ के उनसे सलीक़ा न ज़िंदगी का रहा| कैफ़ी आज़मी