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मुझको रंज सहना आ गया!
पी के आँसू सी के लब बैठा हूँ यूँ इस बज़्म में, दर-हक़ीक़त जैसे मुझको रंज सहना आ गया| आनंद नारायण मुल्ला
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मोती का गहना आ गया!
तुझको अपना ही लिया आख़िर निगार-ए-इश्क़ ने, ऐ उरूस-ए-चश्म ले मोती का गहना आ गया| आनंद नारायण मुल्ला
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रुख़ पर हम को बहना आ गया!
ज़िंदगी से क्या लड़ें जब कोई भी अपना नहीं, हो के शल धारे के रुख़ पर हम को बहना आ गया| आनंद नारायण मुल्ला
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अब मुझको कहना आ गया!
पूछता कोई नहीं अब मुझ से मेरा हाल-ए-दिल, शायद अपना हाल-ए-दिल अब मुझको कहना आ गया| आनंद नारायण मुल्ला
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मुझको रंज सहना आ गया!
आरज़ू को दिल ही दिल में घुट के रहना आ गया, और वो ये समझे कि मुझको रंज सहना आ गया| आनंद नारायण मुल्ला
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मिल के बिछड़ना ज़रूर था!
दुनिया है ये किसी का न इसमें क़ुसूर था, दो दोस्तों का मिल के बिछड़ना ज़रूर था| आनंद नारायण मुल्ला
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एक उम्र मुस्कान की!
आज फिर से मैं अपने अत्यंत प्रिय नवगीतकार स्वर्गीय रमेश रंजक जी का एक सुंदर गीत शेयर कर रहा हूँ| रंजक जी के बहुत से गीत मैंने पहले भी शेयर किए हैं और उनके बारे में काफी लिखा भी है| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय रमेश रंजक जी का एक सुंदर गीत – इतनी ही…
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भीड़ में भी जाए तो तन्हा दिखाई दे!
क्या हुस्न है जमाल है क्या रंग-रूप है, वो भीड़ में भी जाए तो तन्हा दिखाई दे| कृष्ण बिहारी नूर
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अजीब शर्त है दीदार के लिए!
कैसी अजीब शर्त है दीदार के लिए, आँखें जो बंद हों तो वो जल्वा दिखाई दे| कृष्ण बिहारी नूर