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जब भी हम ख़ानुमाँ-ख़राब आए!
जल उठे बज़्म-ए-ग़ैर के दर-ओ-बाम, जब भी हम ख़ानुमाँ-ख़राब आए| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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आँखें बोलेंगी!
आज एक और सुंदर कविता स्वर्गीय भवानीप्रसाद मिश्र जी की शेयर कर रहा हूँ| भवानी दादा की बहुत सी कविताएं मैंने पहले भी शेयर की हैं और उनके बारे में काफी लिखा भी है| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय भवानीप्रसाद मिश्र जी की एक और सुंदर कविता – जीभ की ज़रूरत नहीं है क्योंकि कहकर…
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अब ‘मुल्ला’ को कहना आ गया!
लब पे नग़्मा और रुख़ पर इक तबस्सुम की नक़ाब, अपने दिल का दर्द अब ‘मुल्ला’ को कहना आ गया| आनंद नारायण मुल्ला