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भीगी पलकें न झुका!
एक पुरानी ब्लॉग पोस्ट और मुकेश जी का एक प्यारा गीत, एक बार और! आज मुझे मेरे प्रिय गायक स्वर्गीय मुकेश जी का गाया एक बहुत सुंदर गीत याद आ रहा है | फिल्म- साथी के लिए इस गीत को लिखा था मजरूह सुल्तानपुरी साहब ने और इसका संगीत दिया था- नौशाद साहब ने| कुल…
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अब के बरस भी यहीं से निकलेगा!
गुज़िश्ता साल के ज़ख़्मो हरे-भरे रहना, जुलूस अब के बरस भी यहीं से निकलेगा| राहत इन्दौरी
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डूबेगा सूरज वहीं से निकलेगा!
बुज़ुर्ग कहते थे इक वक़्त आएगा जिस दिन, जहाँ पे डूबेगा सूरज वहीं से निकलेगा| राहत इन्दौरी
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ख़ज़ाना यहीं से निकलेगा!
इसी गली में वो भूखा फ़क़ीर रहता था, तलाश कीजे ख़ज़ाना यहीं से निकलेगा| राहत इन्दौरी
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ख़ुलूस मिरी आस्तीं से निकलेगा!
मैं जानता था कि ज़हरीला साँप बन बन कर, तिरा ख़ुलूस मिरी आस्तीं से निकलेगा| राहत इन्दौरी
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पाँव का काँटा हमीं से निकलेगा!
न हम-सफ़र न किसी हम-नशीं से निकलेगा, हमारे पाँव का काँटा हमीं से निकलेगा| राहत इन्दौरी
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ज़हर नहीं हैं कि मैं खा भी न सकूँ!
इक न इक रोज़ कहीं ढूँढ ही लूँगा तुझको, ठोकरें ज़हर नहीं हैं कि मैं खा भी न सकूँ| राहत इन्दौरी
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कमज़ोर शाख़ें कि हिला भी न सकूँ!
फल तो सब मेरे दरख़्तों के पके हैं लेकिन, इतनी कमज़ोर हैं शाख़ें कि हिला भी न सकूँ| राहत इन्दौरी
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बुलाया है कि जा भी न सकूँ!
मिरी ग़ैरत भी कोई शय है कि महफ़िल में मुझे, उसने इस तरह बुलाया है कि जा भी न सकूँ| राहत इन्दौरी
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ख़त तो नहीं है कि जला भी न सकूँ!
फूँक डालूँगा किसी रोज़ मैं दिल की दुनिया, ये तिरा ख़त तो नहीं है कि जला भी न सकूँ| राहत इन्दौरी