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ये होश ये ग़फ़लत कहाँ कहाँ!
ऐ नर्गिस-ए-सियाह बता दे तिरे निसार, किस किस को है ये होश ये ग़फ़लत कहाँ कहाँ| फ़िराक़ गोरखपुरी
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देख ये वहशत कहाँ कहाँ!
दिल के उफ़क़ तक अब तो हैं परछाइयाँ तिरी, ले जाए अब तो देख ये वहशत कहाँ कहाँ| फ़िराक़ गोरखपुरी
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ये मुसीबत कहाँ कहाँ!
राह-ए-तलब में छोड़ दिया दिल का साथ भी, फिरते लिए हुए ये मुसीबत कहाँ कहाँ| फ़िराक़ गोरखपुरी
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ऐ ग़म-ए-फ़ुर्क़त कहाँ कहाँ!
फ़ुर्क़त हो या विसाल वही इज़्तिराब है, तेरा असर है ऐ ग़म-ए-फ़ुर्क़त कहाँ कहाँ| फ़िराक़ गोरखपुरी
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तुझसे छूट के तबीअ’त कहाँ कहाँ!
बेताबी-ओ-सुकूँ की हुईं मंज़िलें तमाम, बहलाएँ तुझसे छूट के तबीअ’त कहाँ कहाँ| फ़िराक़ गोरखपुरी
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मुझको मोहब्बत कहाँ कहाँ!
आई है कुछ न पूछ क़यामत कहाँ कहाँ, उफ़ ले गई है मुझको मोहब्बत कहाँ कहाँ| फ़िराक़ गोरखपुरी
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मूल्य दे सुख के क्षणों का!
आज एक बार फिर मैं प्रसिद्ध आधुनिक हिन्दी कवि, सीनियर बच्चन जी की एक सुंदर रचना शेयर कर रहा हूँ| स्वर्गीय हरिवंशराय बच्चन जी किसी जमाने में हिन्दी काव्य मंचों की शान हुआ करते थे, उनको सुनने के लिए श्रोतागण दूर-दूर से कवि सम्मेलनों में आते थे| मैंने पहले भी बच्चन जी के बहुत से…