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मैंने भी जाम रख दिया!
शिद्दत-ए-तिश्नगी में भी ग़ैरत-ए-मय-कशी रही, उसने जो फेर ली नज़र मैंने भी जाम रख दिया| अहमद फ़राज़
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दिल सर-ए-शाम रख दिया!
आमद-ए-दोस्त की नवेद कू-ए-वफ़ा में आम थी, मैंने भी इक चराग़ सा दिल सर-ए-शाम रख दिया| अहमद फ़राज़
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मैं तुझसे प्रीत लगा बैठा!
आज मैं हिन्दी के एक श्रेष्ठ कवि श्री उदयभानु ‘हंस’ जी की एक रचना, शेयर कर रहा हूँ| इनको हरियाणा के राज्यकवि का दर्जा प्रदान किया गया, बाकी रचना स्वयं अपना परिचय देती है|लीजिए, प्रस्तुत है श्री उदयभानु ‘हंस’ जी की यह रचना- तू चाहे चंचलता कह ले,तू चाहे दुर्बलता कह ले,दिल ने ज्यों ही…
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हाथ में ख़ाली कमान बाक़ी है!
अब आया तीर चलाने का फ़न तो क्या आया, हमारे हाथ में ख़ाली कमान बाक़ी है| जावेद अख़्तर
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बात ख़त्म हुई दास्तान बाक़ी है!
ज़रा सी बात जो फैली तो दास्तान बनी, वो बात ख़त्म हुई दास्तान बाक़ी है| जावेद अख़्तर
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दर्द ज़रा सा निशान बाक़ी है!
वो ज़ख़्म भर गया अर्सा हुआ मगर अब तक, ज़रा सा दर्द ज़रा सा निशान बाक़ी है| जावेद अख़्तर
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ज़ेहन की बस्ती में आग ऐसी लगी!
हमारे ज़ेहन की बस्ती में आग ऐसी लगी, कि जो था ख़ाक हुआ इक दुकान बाक़ी है| जावेद अख़्तर
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उनसे जो थी गुफ़्तुगू वो ख़त्म हुई!
हमारी उनसे जो थी गुफ़्तुगू वो ख़त्म हुई, मगर सुकूत सा कुछ दरमियान बाक़ी है| जावेद अख़्तर
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अभी वो मकान बाक़ी है!
हमारे घर को तो उजड़े हुए ज़माना हुआ, मगर सुना है अभी वो मकान बाक़ी है| जावेद अख़्तर
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कोई इम्तिहान बाक़ी है!
अभी ज़मीर में थोड़ी सी जान बाक़ी है, अभी हमारा कोई इम्तिहान बाक़ी है| जावेद अख़्तर