Category: Uncategorized
-
फ़क़त आग बुझाने के लिए हैं!
सोचो तो बड़ी चीज़ है तहज़ीब बदन की, वर्ना ये फ़क़त आग बुझाने के लिए हैं| जाँ निसार अख़्तर
-
दर्द कलेजे से लगाने के लिए हैं!
अब ये भी नहीं ठीक कि हर दर्द मिटा दें, कुछ दर्द कलेजे से लगाने के लिए हैं| जाँ निसार अख़्तर
-
फ़क़त उनको सुनाने के लिए हैं!
अशआ’र मिरे यूँ तो ज़माने के लिए हैं, कुछ शेर फ़क़त उनको सुनाने के लिए हैं| जाँ निसार अख़्तर
-
रात गए कोई किरन मेरे बराबर!
जब रात गए कोई किरन मेरे बराबर, चुप-चाप सी सो जाए तो लगता है कि तुम हो| जाँ निसार अख़्तर
-
नद्दी कोई बल खाए तो लगता है!
ओढ़े हुए तारों की चमकती हुई चादर, नद्दी कोई बल खाए तो लगता है कि तुम हो| जाँ निसार अख़्तर
-
महकती हुई पुर-कैफ़ हवा का!
संदल से महकती हुई पुर-कैफ़ हवा का, झोंका कोई टकराए तो लगता है कि तुम हो| जाँ निसार अख़्तर
-
लचक जाए तो लगता है कि तुम हो!
जब शाख़ कोई हाथ लगाते ही चमन में, शरमाए लचक जाए तो लगता है कि तुम हो| जाँ निसार अख़्तर
-
तो लगता है कि तुम हो!
आहट सी कोई आए तो लगता है कि तुम हो, साया कोई लहराए तो लगता है कि तुम हो| जाँ निसार अख़्तर
-
प्यार तुम्हें दे सकता हूँ!
आज एक बार फिर मैं हिन्दी के एक श्रेष्ठ कवि और राजनीति में भी सक्रिय रहे श्री उदयप्रताप सिंह जी की एक रचना, शेयर कर रहा हूँ| जैसा शायद मैंने पहले भी उल्लेख किया है, उदयप्रताप सिंह जी, श्री मुलायम सिंह के गुरू रहे हैं| लीजिए, प्रस्तुत श्री उदयप्रताप सिंह जी की यह रचना- मैं…