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उनसे जो थी गुफ़्तुगू वो ख़त्म हुई!
हमारी उनसे जो थी गुफ़्तुगू वो ख़त्म हुई, मगर सुकूत सा कुछ दरमियान बाक़ी है| जावेद अख़्तर
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अभी वो मकान बाक़ी है!
हमारे घर को तो उजड़े हुए ज़माना हुआ, मगर सुना है अभी वो मकान बाक़ी है| जावेद अख़्तर
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कोई इम्तिहान बाक़ी है!
अभी ज़मीर में थोड़ी सी जान बाक़ी है, अभी हमारा कोई इम्तिहान बाक़ी है| जावेद अख़्तर
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बे-कफ़न फिर ये लाश क्यूँ है!
न फ़िक्र कोई न जुस्तुजू है न ख़्वाब कोई न आरज़ू है, ये शख़्स तो कब का मर चुका है तो बे-कफ़न फिर ये लाश क्यूँ है| जावेद अख़्तर
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न पूछा दिल पे ऐसी ख़राश क्यूँ है!
कोई अगर पूछता ये हमसे बताते हम गर तो क्या बताते, भला हो सबका कि ये न पूछा कि दिल पे ऐसी ख़राश क्यूँ है| जावेद अख़्तर
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मुझको तेरी तलाश क्यूँ है!
कभी कभी मैं ये सोचता हूँ कि मुझको तेरी तलाश क्यूँ है, कि जब हैं सारे ही तार टूटे तो साज़ में इर्तिआ’श क्यूँ है| जावेद अख़्तर
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कभी-कभी बहुत भला लगता है!
आज मैं हिन्दी के श्रेष्ठ कवि एवं नवगीतकार स्वर्गीय उमाकांत मालवीय जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ, ये एक प्रसिद्ध कवि थे और मैंने इनकी रचनाएं पहले भी शेयर की हैं| लीजिए प्रस्तुत है स्वर्गीय उमाकांत मालवीय जी की यह रचना- कभी-कभी बहुत भला लगता है —चुप-चुप सब कुछ सुननाऔर कुछ न बोलना…
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इल्म का सौदा ये रिसाले ये किताबें!
ये इल्म का सौदा ये रिसाले ये किताबें, इक शख़्स की यादों को भुलाने के लिए हैं| जाँ निसार अख़्तर
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फ़क़त दीप जलाने के लिए हैं!
देखूँ तिरे हाथों को तो लगता है तिरे हाथ, मंदिर में फ़क़त दीप जलाने के लिए हैं| जाँ निसार अख़्तर
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ख़्वाब पलकों पे सजाने के लिए हैं!
आँखों में जो भर लोगे तो काँटों से चुभेंगे, ये ख़्वाब तो पलकों पे सजाने के लिए हैं| जाँ निसार अख़्तर