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वक़्त की मीनार पर!
आज मैं हिन्दी नवगीत के प्रतिष्ठापक और एक श्रेष्ठ कवि एवं नवगीतकार स्वर्गीय शंभूनाथ सिंह जी की एक रचना, शेयर कर रहा हूँ| हिन्दी नवगीत के पुरोधा के रूप में इनका बहुत सम्मान है|लीजिए, प्रस्तुत है स्वर्गीय शंभूनाथ सिंह जी का यह गीत- मैं तुम्हारे साथ हूँहर मोड़ पर संग-संग मुड़ा हूँ। तुम जहाँ भी…
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हज़ार रंग में डूबी हुई हवा क्यूँ है!
अगर तबस्सुम-ए-ग़ुंचा की बात उड़ी थी यूँही, हज़ार रंग में डूबी हुई हवा क्यूँ है| राही मासूम रज़ा
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मरीज़ में जीने का हौसला क्यूँ है!
जो दूर दूर नहीं कोई दिल की राहों पर, तो इस मरीज़ में जीने का हौसला क्यूँ है| राही मासूम रज़ा
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तिरा इतना फ़ासला क्यूँ है!
सवाल कर दिया तिश्ना-लबी ने साग़र से, मिरी तलब से तिरा इतना फ़ासला क्यूँ है| राही मासूम रज़ा
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मिरी मंज़िल का रास्ता क्यूँ है!
दिलों की राह पर आख़िर ग़ुबार सा क्यूँ है, थका थका मिरी मंज़िल का रास्ता क्यूँ है| राही मासूम रज़ा
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ख़ुश्बू के मकाँ कैसे हैं!
जिनसे हम छूट गए अब वो जहाँ कैसे हैं, शाख़-ए-गुल कैसी है ख़ुश्बू के मकाँ कैसे हैं| राही मासूम रज़ा
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वहशत की सौग़ात कहाँ!
जिसको देखो फ़िक्र-ए-रफ़ू है जिसको देखो वो नासेह, बस्ती वालों में हार आए वहशत की सौग़ात कहाँ| राही मासूम रज़ा
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जंगल काफ़ी है वहशत के लिए!
बे-हिस दीवारों का जंगल काफ़ी है वहशत के लिए, अब क्यूँ हम सहरा को जाएँ अब वैसे हालात कहाँ| राही मासूम रज़ा
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तुमने गुज़ारी रात कहाँ!
ऐ आवारा यादो फिर ये फ़ुर्सत के लम्हात कहाँ, हमने तो सहरा में बसर की तुमने गुज़ारी रात कहाँ| राही मासूम रज़ा