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अपना सूरज वो उठा लेता है!
क़द से बढ़ जाए जो साया तो बुरा लगता है, अपना सूरज वो उठा लेता है हर शाम के बाद| कृष्ण बिहारी ‘नूर’
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ख़फ़ा मेरी नज़र शाम के बाद!
दिन तिरे हिज्र में कट जाता है जैसे-तैसे, मुझसे रहती है ख़फ़ा मेरी नज़र शाम के बाद| कृष्ण बिहारी ‘नूर’
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जो लौट आया हो घर शाम के बाद!
उससे दरयाफ़्त न करना कभी दिन के हालात, सुब्ह का भूला जो लौट आया हो घर शाम के बाद| कृष्ण बिहारी ‘नूर’
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तेज धूप में!
आज मैं हिन्दी के एक श्रेष्ठ कवि, जो कवि सम्मेलनों में मुख्यतः हास्य-व्यंग्य की कविताओं के लिए जाने जाते थे- स्वर्गीय कैलाश गौतम जी की रचना शेयर कर रहा हूँ| उनकी कुछ रचनाएं जैसे- ‘अमौस्या का मेला’ अथवा ‘मगर मेरे बेटे कचहरी न जाना’ बहुत सफल रचनाएं थीं| मेरी आयोजनों में आमंत्रित करने का कारण…
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खिलते हैं मगर शाम के बाद!
तेज़ हो जाता है ख़ुशबू का सफ़र शाम के बाद, फूल शहरों में भी खिलते हैं मगर शाम के बाद| कृष्ण बिहारी ‘नूर’
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दहलीज़ पे ऐ ‘नूर’ उजाला है बहुत!
कोई आया है ज़रूर और यहाँ ठहरा भी है, घर की दहलीज़ पे ऐ ‘नूर’ उजाला है बहुत| कृष्ण बिहारी ‘नूर’
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ख़ुद को तराशा है बहुत!
मिरे हाथों की लकीरों के इज़ाफ़े हैं गवाह, मैंने पत्थर की तरह ख़ुद को तराशा है बहुत| कृष्ण बिहारी ‘नूर’
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कभी क़तरा है बहुत!
तिश्नगी के भी मक़ामात हैं क्या क्या यानी, कभी दरिया नहीं काफ़ी कभी क़तरा है बहुत| कृष्ण बिहारी ‘नूर’
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देखा तो नहीं है उसे सोचा है बहुत!
रात हो दिन हो कि ग़फ़लत हो कि बेदारी हो, उसको देखा तो नहीं है उसे सोचा है बहुत| कृष्ण बिहारी ‘नूर’
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बिछड़ जाने का धड़का है बहुत!
इक ग़ज़ल उस पे लिखूँ दिल का तक़ाज़ा है बहुत, इन दिनों ख़ुद से बिछड़ जाने का धड़का है बहुत| कृष्ण बिहारी ‘नूर’