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ख़ामुशी जिनकी तर्जुमानी है!
ऐ लब-ए-नाज़ क्या हैं वो असरार, ख़ामुशी जिनकी तर्जुमानी है| फ़िराक़ गोरखपुरी
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क्या तिरे ग़म की पासबानी है!
दिल मिरा और ये ग़म-ए-दुनिया, क्या तिरे ग़म की पासबानी है| फ़िराक़ गोरखपुरी
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दिल उसी ग़म की राजधानी है!
दोनों आलम हैं जिसके ज़ेर-ए-नगीं, दिल उसी ग़म की राजधानी है| फ़िराक़ गोरखपुरी
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लहर सागर का नहीं श्रृंगार!
आज एक बार फिर मैं हिन्दी काव्य मंचों पर हिन्दी गीत को एक नई पहचान देने वाले, गीत विधा के शिखर पुरुष स्वर्गीय हरिवंशराय बच्चन जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ, बच्चन जी के बहुत से गीत मैंने पहले भी शेयर किए हैं और वे किसी परिचय के मोहताज़ नहीं हैं| लीजिए, आज…