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तुम रहे हो द्वीप जैसे!
आज एक बार फिर मैं हिन्दी के श्रेष्ठ गीतकार और कवि सम्मेलनों के बहुत अच्छे संचालक श्री सोम ठाकुर जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| यह मेरा सौभाग्य है कि सोम जी को कई बार अपने कवि सम्मेलनों में आमंत्रित करने और उनका काव्य पाठ सुनने का अवसर मुझे मिला था| लीजिए, आज…
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जब्र है मैं जिसके इख़्तियार में हूँ!
मैं हूँ भी और नहीं भी अजीब बात है ये, ये कैसा जब्र है मैं जिसके इख़्तियार में हूँ| मुनीर नियाज़ी
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सफ़र में किसी दयार में हूँ!
बस इतना होश है मुझको कि अजनबी हैं सब, रुका हुआ हूँ सफ़र में किसी दयार में हूँ| मुनीर नियाज़ी
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घर में हूँ या मैं किसी मज़ार में हूँ!
मकाँ है क़ब्र जिसे लोग ख़ुद बनाते हैं, मैं अपने घर में हूँ या मैं किसी मज़ार में हूँ| मुनीर नियाज़ी
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जा भी चुका है मैं इंतिज़ार में हूँ!
ये कैसा नश्शा है मैं किस अजब ख़ुमार में हूँ, तू आ के जा भी चुका है मैं इंतिज़ार में हूँ| मुनीर नियाज़ी