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तुझे कैसे भूल जाऊँ!
एक बार फिर मैं आज आपातकाल में अपनी विद्रोह भारी ग़ज़लों से जन-जन में लोकप्रिय हुए हिन्दी के श्रेष्ठ कवि स्वर्गीय दुष्यंत कुमार जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| काफी समय से मैंने उनकी कोई ग़ज़ल शेयर नहीं की है, शायद बाद में करूंगा| लीजिए, आज प्रस्तुत है स्वर्गीय दुष्यंत कुमार जी की…
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ग़म-ए-हस्ती भी गवारा कि तुम हो!
ऐ जान-ए-‘फ़राज़’ इतनी भी तौफ़ीक़ किसे थी, हम को ग़म-ए-हस्ती भी गवारा है कि तुम हो| अहमद फ़राज़
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अभी शहर में ज़िंदा है कि तुम हो!
आबाद हम आशुफ़्ता-सरों से नहीं मक़्तल, ये रस्म अभी शहर में ज़िंदा है कि तुम हो| अहमद फ़राज़
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तन्हा कोई हम सा है कि तुम हो!
वो वक़्त न आए कि दिल-ए-ज़ार भी सोचे, इस शहर में तन्हा कोई हम सा है कि तुम हो| अहमद फ़राज़
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दरिया है कि तुम हो!
इक दर्द का फैला हुआ सहरा है कि मैं हूँ, इक मौज में आया हुआ दरिया है कि तुम हो| अहमद फ़राज़
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शीरीं है कि लैला है कि तुम हो!
हर बज़्म में मौज़ू-ए-सुख़न दिल-ज़दगाँ का, अब कौन है शीरीं है कि लैला है कि तुम हो| अहमद फ़राज़
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मुझको यही लगता है कि तुम हो!
ये उम्र-ए-गुरेज़ाँ कहीं ठहरे तो ये जानूँ, हर साँस में मुझको यही लगता है कि तुम हो| अहमद फ़राज़
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किसी और का चेहरा है कि तुम हो!
देखो ये किसी और की आँखें हैं कि मेरी, देखूँ ये किसी और का चेहरा है कि तुम हो| अहमद फ़राज़