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अपने आप में!
आज एक बार फिर मैं हिन्दी के अपनी किस्म के अनूठे कवि स्वर्गीय भवानीप्रसाद मिश्र जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| भवानी दादा की कविताओं को पढ़ना अपने आप में एक अलग ही किस्म के अनुभव से गुजरना होता है| लीजिए, आज प्रस्तुत है स्वर्गीय भवानीप्रसाद मिश्र जी की यह कविता, जिसमें उन्होंने…
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मेहर-ओ-माह को पैमाना हम!
या जगा देते हैं ज़र्रों के दिलों में मय-कदे, या बना लेते हैं मेहर-ओ-माह को पैमाना हम| अली सरदार जाफ़री
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इस अहद का अफ़्साना हम!
मिटते मिटते दे गए हम ज़िंदगी को रंग-ओ-नूर, रफ़्ता रफ़्ता बन गए इस अहद का अफ़्साना हम| अली सरदार जाफ़री
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बा-शौकत-ए-शाहाना हम!
राह में फ़ौजों के पहरे सर पे तलवारों की छाँव, आए हैं ज़िंदाँ में भी बा-शौकत-ए-शाहाना हम| अली सरदार जाफ़री
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लिए फिरते हैं ज़िंदाँ-ख़ाना हम!
क्या बला जब्र-ए-असीरी है कि आज़ादी में भी, दोश पर अपने लिए फिरते हैं ज़िंदाँ-ख़ाना हम| अली सरदार जाफ़री
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गुल-ओ-गुलज़ार हर वीराना हम!
ख़ून-ए-दिल से चश्म-ए-तर तक चश्म-ए-तर से ता-ब-ख़ाक, कर गए आख़िर गुल-ओ-गुलज़ार हर वीराना हम| अली सरदार जाफ़री