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लोग तो आँखों में ख़्वाब रखते हैं!
हमारे शहर के मंज़र न देख पाएँगे, यहाँ के लोग तो आँखों में ख़्वाब रखते हैं| राहत इन्दौरी
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लोग कि जो हर्फ़-आशना भी नहीं!
बहुत से लोग कि जो हर्फ़-आशना भी नहीं, इसी में ख़ुश हैं कि तेरी किताब रखते हैं| राहत इन्दौरी
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घर में कई आफ़्ताब रखते हैं!
हमें चराग़ समझ कर बुझा न पाओगे, हम अपने घर में कई आफ़्ताब रखते हैं| राहत इन्दौरी
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चेहरों पे दोहरी नक़ाब रखते हैं!
दिलों में आग लबों पर गुलाब रखते हैं, सब अपने चेहरों पे दोहरी नक़ाब रखते हैं| राहत इन्दौरी
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अंधी दीवाली, गूँगी होली बाबू जी!
आज एक पुरानी ब्लॉग पोस्ट के माध्यम से अपने लिए गुरू तुल्य रहे स्वर्गीय डॉ कुँवर बेचैन जी को याद कर रहा हूँ | उनकी मृत्यु का दुखद समाचार मिलने पर पहली बार ये ब्लॉग पोस्ट मैंने उनको श्रद्धांजलि स्वरूप, उनकी दो रचनाएँ पुनः प्रस्तुत करते हुए लिखी थी| डॉ कुँवर बेचैन जी मेरे अग्रजों…
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थोड़ा मुक़द्दर तलाश कर!
कोशिश भी कर उमीद भी रख रास्ता भी चुन, फिर इसके बा’द थोड़ा मुक़द्दर तलाश कर| निदा फ़ाज़ली
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वो लश्कर तलाश कर!
तारीख़ में महल भी है हाकिम भी तख़्त भी, गुमनाम जो हुए हैं वो लश्कर तलाश कर| निदा फ़ाज़ली
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तो समुंदर तलाश कर!
सूरज के इर्द-गिर्द भटकने से फ़ाएदा, दरिया हुआ है गुम तो समुंदर तलाश कर| निदा फ़ाज़ली