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कुछ हैं छोटे तो कुछ बड़े हैं पेड़!
अपनी दुनिया के लोग लगते हैं,कुछ हैं छोटे तो कुछ बड़े हैं पेड़| सूर्यभानु गुप्त
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परचमों की तरह गड़े हैं पेड़!
जीत कर कौन इस ज़मीं को गया,परचमों की तरह गड़े हैं पेड़| सूर्यभानु गुप्त
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कौन कहता है ये कड़े हैं पेड़!
कोंपलें फूल पत्तियाँ देखो,कौन कहता है ये कड़े हैं पेड़| सूर्यभानु गुप्त
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कौन सी बात पर अड़े हैं पेड़!
जिस जगह हैं न टस से मस होंगे,कौन सी बात पर अड़े हैं पेड़| सूर्यभानु गुप्त
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साल हा साल से खड़े हैं पेड़!
क्या ख़बर इंतिज़ार है किसका,साल हा साल से खड़े हैं पेड़| सूर्यभानु गुप्त
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रात तूफ़ान से लड़े हैं पेड़!
उल्टे सीधे गिरे पड़े हैं पेड़,रात तूफ़ान से लड़े हैं पेड़| सूर्यभानु गुप्त
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जीवन!
आज एक बार फिर मैं आधुनिक हिन्दी कविता में अपना अलग स्थान बनाने वाले श्री अशोक वाजपेयी जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| अशोक वाजपेयी जी का कविता लिखने का, अभिव्यक्ति का अलग ही अंदाज़ है, जो इस कविता में भी प्रदर्शित होता है| लीजिए, आज प्रस्तुत है श्री अशोक वाजपेयी जी की…