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दोनों को इक साथ न लिखने पाऊँ!
हिन्दू को हिन्दू मुसलमान को लिक्खूँ मुस्लिम, कभी इन दोनों को इक साथ न लिखने पाऊँ| राजेश रेड्डी
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हालात न लिखने पाऊँ!
दिन को दिन रात को मैं रात न लिखने पाऊँ, उनकी कोशिश है कि हालात न लिखने पाऊँ| राजेश रेड्डी
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मुनादी!
आज एक बार फिर मैं हिन्दी के प्रसिद्ध कवि और साप्ताहिक पत्रिका ‘धर्मयुग’ के यशस्वी संपादक रहे स्वर्गीय धर्मवीर भारती जी की एक लंबी और प्रसिद्ध कविता शेयर कर रहा हूँ जो उन्होंने आपातकाल में लिखी थी क्योंकि उस समय के शासन को जयप्रकाश नारायण जी के आंदोलन से निपटने के लिए दमन का ही…
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रोज़ के सदमात ने रोने न दिया!
एक दो रोज़ का सदमा हो तो रो लें “फ़ाकिर”,हमको हर रोज़ के सदमात ने रोने न दिया| सुदर्शन फ़ाकिर
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वक़्त-ए-मुलाक़ात ने रोने न दिया!
तुझसे मिलकर हमें रोना था बहुत रोना था,तंगी-ए-वक़्त-ए-मुलाक़ात ने रोने न दिया| सुदर्शन फ़ाकिर
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मजबूरी-ए-हालात ने रोने न दिया!
रोनेवालों से कह दो उनका भी रोना रो लें,जिनको मजबूरी-ए-हालात ने रोने न दिया| सुदर्शन फ़ाकिर
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ग़ैरत-ए-जज़्बात ने रोने न दिया!
इश्क़ में ग़ैरत-ए-जज़्बात ने रोने न दिया,वर्ना क्या बात थी किस बात ने रोने न दिया| सुदर्शन फ़ाकिर
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दुश्मनों का भी दिल हिला देगा!
हमसे पूछो न दोस्ती का सिला,दुश्मनों का भी दिल हिला देगा| सुदर्शन फ़ाकिर