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प्यास के फूँके हुए ये वीराने!
यहाँ से जल्द गुज़र जाओ क़ाफ़िले वालो, हैं मेरी प्यास के फूँके हुए ये वीराने| कैफ़ी आज़मी
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झरना!
आज हिन्दी कविता में छायावाद युग के प्रमुख स्तंभ रहे स्वर्गीय जयशंकर प्रसाद जी की एक रचना प्रस्तुत कर रहा हूँ| मैंने पहले भी उनकी कुछ रचनाएं शेयर की हैं| ‘कामायनी’, ‘आँसू’ आदि उनकी कालजयी रचनाएं हैं| लीजिए, आज प्रस्तुत है स्वर्गीय जयशंकर प्रसाद जी की यह कविता – तिरस्कार कालिमा कलित हैं,अविश्वास-सी पिच्छल हैं।कौन…
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क्या क्या समझ बैठे थे हम!
हुस्न को इक हुस्न ही समझे नहीं और ऐ ‘फ़िराक़’, मेहरबाँ ना-मेहरबाँ क्या क्या समझ बैठे थे हम| फ़िराक़ गोरखपुरी
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तेरे हिज्र में तन्हा समझ बैठे थे हम!
रफ़्ता रफ़्ता इश्क़ मानूस-ए-जहाँ होता चला, ख़ुद को तेरे हिज्र में तन्हा समझ बैठे थे हम| फ़िराक़ गोरखपुरी
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ख़त्म हो जाना समझ बैठे थे हम!
कान बजते हैं मोहब्बत के सुकूत-ए-नाज़ को, दास्ताँ का ख़त्म हो जाना समझ बैठे थे हम| फ़िराक़ गोरखपुरी
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तबीअ’त का समझ बैठे थे हम!
भूल बैठी वो निगाह-ए-नाज़ अहद-ए-दोस्ती, उसको भी अपनी तबीअ’त का समझ बैठे थे हम| फ़िराक़ गोरखपुरी
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दुनिया से बेगाना समझ बैठे थे हम!
बे-नियाज़ी को तिरी पाया सरासर सोज़ ओ दर्द, तुझ को इक दुनिया से बेगाना समझ बैठे थे हम| फ़िराक़ गोरखपुरी
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दर्द-अफ़ज़ा समझ बैठे थे हम!
क्या कहें उल्फ़त में राज़-ए-बे-हिसी क्यूँकर खुला, हर नज़र को तेरी दर्द-अफ़ज़ा समझ बैठे थे हम| फ़िराक़ गोरखपुरी