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मरघट!
किसी जमाने में हिन्दी काव्य मंचों से जिन कवियों को सुनने में मुझे काफी आनंद आता था, उनमें स्वर्गीय शिशुपाल सिंह ‘निर्धन’ जी भी शामिल थे| उनके एक गीत की पंक्तियाँ बहुत प्रसिद्ध हुई थीं- एक पुराने दुख ने पूछा क्या तुम अभी वहीं रहते हो, उत्तर दिया चले मत आना, मैंने वो घर बदल…
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मगर जो खो गई वो चीज़ क्या थी!
कभी जो ख़्वाब था वो पा लिया है, मगर जो खो गई वो चीज़ क्या थी| जावेद अख़्तर
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हिरन को अपनी कस्तूरी सज़ा थी!
बिछड़ के डार से बन बन फिरा वो, हिरन को अपनी कस्तूरी सज़ा थी| जावेद अख़्तर
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क़दम रक्खा कि मंज़िल रास्ता थी!
हमारे शौक़ की ये इंतिहा थी, क़दम रक्खा कि मंज़िल रास्ता थी| जावेद अख़्तर