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मौसम को उस्ताद किया!
दानाओं की बात न मानी काम आई नादानी ही, सुना हवा को पढ़ा नदी को मौसम को उस्ताद किया| निदा फ़ाज़ली
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दोनों को बरबाद किया!
बात बहुत मा’मूली सी थी उलझ गई तकरारों में, एक ज़रा सी ज़िद ने आख़िर दोनों को बरबाद किया| निदा फ़ाज़ली
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हमने दिल को शाद किया!
बड़े बड़े ग़म खड़े हुए थे रस्ता रोके राहों में, छोटी छोटी ख़ुशियों से ही हमने दिल को शाद किया| निदा फ़ाज़ली
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चिड़ियों को आज़ाद किया!
खोल के खिड़की चाँद हँसा फिर चाँद ने दोनों हाथों से, रंग उड़ाए फूल खिलाए चिड़ियों को आज़ाद किया| निदा फ़ाज़ली
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खोल के फिर आबाद किया!
आज ज़रा फ़ुर्सत पाई थी आज उसे फिर याद किया, बंद गली के आख़िरी घर को खोल के फिर आबाद किया| निदा फ़ाज़ली
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माँ!
आज मैं श्री रामदरश मिश्र जी की माँ के बारे में लिखी गई एक कविता शेयर कर रहा हूँ| इस छोटी सी कविता ने मुझे काफी प्रभावित किया है| मैंने श्री रामदरश मिश्र जी की कुछ कविताएं पहले भी शेयर की हैं| लीजिए प्रस्तुत है श्री रामदरश मिश्र जी की यह कविता – चेहरे परकुछ…