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ख़ामोश तो मंज़र न फ़ना का होता!
ऐसा ख़ामोश तो मंज़र न फ़ना का होता, मेरी तस्वीर भी गिरती तो छनाका होता| गुलज़ार
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ग्रहण!
आज एक बार फिर मैं श्रेष्ठ कवि श्री बुदधिनाथ मिश्र जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ | श्री बुदधिनाथ मिश्र जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए प्रस्तुत है श्री बुदधिनाथ मिश्र जी का यह नवगीत – शहरी विज्ञापन ने हमसेसब-कुछ छीन लिया । आंगन का मटमैला दर्पणपीपल के…
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बाग़ में कोई ज़रूर था!
निकला जो चाँद आई महक तेज़ सी ‘मुनीर’, मेरे सिवा भी बाग़ में कोई ज़रूर था| मुनीर नियाज़ी
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सदा थी किसी भूली याद की!
चेहरा था या सदा थी किसी भूली याद की, आँखें थीं उसकी यारो कि दरिया-ए-नूर था| मुनीर नियाज़ी
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अपने आप पे कितना ग़ुरूर था!
शाम-ए-फ़िराक़ आई तो दिल डूबने लगा, हमको भी अपने आप पे कितना ग़ुरूर था| मुनीर नियाज़ी
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वतन से कई मील दूर था!
रोया था कौन कौन मुझे कुछ ख़बर नहीं, मैं उस घड़ी वतन से कई मील दूर था| मुनीर नियाज़ी
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वो भी बहुत ग़म से चूर था!
कल मैंने उसको देखा तो देखा नहीं गया, मुझ से बिछड़ के वो भी बहुत ग़म से चूर था| मुनीर नियाज़ी
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वही रश्क-ए-हूर था!
पी ली तो कुछ पता न चला वो सुरूर था, वो उसका साया था कि वही रश्क-ए-हूर था| मुनीर नियाज़ी