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क्या हर्ज़ है!
स्वर्गीय भवानीप्रसाद मिश्र जी को आज फिर उनकी एक लंबी कविता के माध्यम से याद कर रहा हूँ| भवानी दादा हर विषय पर एक अलग अंदाज में अपनी प्रस्तुति देते थे| आज की यह कविता प्रेम संबंधों को लेकर है, भवानी दादा की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए प्रस्तुत है स्वर्गीय…
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चेहरा अपना भी ख़ुदा का होता!
क्यूँ मिरी शक्ल पहन लेता है छुपने के लिए, एक चेहरा कोई अपना भी ख़ुदा का होता| गुलज़ार
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ख़ुशबू की तरह रंग हिना का होता!
काँच के पार तिरे हाथ नज़र आते हैं, काश ख़ुशबू की तरह रंग हिना का होता| गुलज़ार
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पलकों की हवा का होता!
साँस मौसम की भी कुछ देर को चलने लगती, कोई झोंका तिरी पलकों की हवा का होता| गुलज़ार
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दरिया की अना का होता!
यूँ भी इक बार तो होता कि समुंदर बहता, कोई एहसास तो दरिया की अना का होता| गुलज़ार