Category: Uncategorized
-
उम्र ज्यों—ज्यों बढ़ती है!
आज एक बार फिर मैं स्वर्गीय सर्वेश्वरदयाल सक्सेना जी की एक छोटी सी लेकिन प्रभावशाली कविता शेयर कर रहा हूँ, बढ़ती उम्र के बारे में एक अलग ही नजरिया इसमें प्रस्तुत किया गया है| सर्वेश्वरदयाल सक्सेना जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय सर्वेश्वरदयाल सक्सेना जी की…
-
उन ज़ुल्फ़ों में रात हो गई है!
अब हो मुझे देखिए कहाँ सुब्ह, उन ज़ुल्फ़ों में रात हो गई है| फ़िराक़ गोरखपुरी
-
क्यूँ ग़म से नजात हो गई है!
ग़म से छूटकर ये ग़म है मुझको, क्यूँ ग़म से नजात हो गई है| फ़िराक़ गोरखपुरी